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अक्टूबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं जो करता हूँ उस पर पूरा ध्यान कैसे लगाऊँ?

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मैं जो करता हूँ उस पर पूरा ध्यान कैसे लगाऊँ? तो, मेरे पास स्पष्ट और पूर्ण एकाग्रता है। अपने ध्यान और एकाग्रता में सुधार करना एक मूल्यवान कौशल है जो आपकी उत्पादकता और समग्र कल्याण को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकता है। इसे प्राप्त करने में आपकी सहायता के लिए यहाँ कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं: ध्यान और ध्यान: १.ध्यान का अभ्यास करें: वर्तमान क्षण की जागरूकता विकसित करने के लिए ध्यानपूर्ण श्वास और ध्यान जैसे ध्यानपूर्ण अभ्यासों में संलग्न हों। यह विकर्षणों को कम करने और ध्यान केंद्रित करने की आपकी क्षमता में सुधार करने में मदद करता है। २.छोटी शुरुआत करें: छोटे ध्यान सत्रों से शुरू करें और धीरे-धीरे अवधि बढ़ाएँ क्योंकि आप अधिक सहज होते जाते हैं। ३ध्यानपूर्ण श्वास: अपनी सांस पर ध्यान केंद्रित करें, धीरे-धीरे और गहरी साँस लें और छोड़ें। यह सरल तकनीक आपका ध्यान वर्तमान क्षण पर केंद्रित कर सकती है। पर्यावरणीय कारक: १.एक केंद्रित कार्यक्षेत्र बनाएँ: काम या अध्ययन के लिए एक विशिष्ट क्षेत्र निर्दिष्ट करें जो विकर्षणों से मुक्त हो। अव्यवस्था मुक्त वातावरण आपकी एकाग्रता में काफी सुधार कर ...

क्यों तुम्हारा मन अशांत है ?

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चौथा प्रश्न : भगवान, एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि जैसे आप बैठते हैं ठीक वैसे ही पूरे दो घंटा बैठे रहते हैं। आपके शरीर का कोई अंग हिलता ही नहीं, केवल एक हाथ हिलता है। और हम पांच मिनिट भी शांत नहीं बैठ पाते । अमृत कृष्ण, वह एक हाथ भी तुम्हारी वजह से हिलाना पड़ता है। तुम्हारी अशांति के कारण। नहीं तो उसको भी हिलाने की कोई जरूरत नहीं है। तुम अगर शांत बैठ जाओ तो वह हाथ भी न हिले। तुम्हारा मन अशांत है तो उसकी प्रतिछाया शरीर पर पड़ती है। तुम्हारा शरीर तो तुम्हारे मन के अनुकूल होता है; उसकी छाया है। आनंद ने बुद्ध से पूछा है कि आप जैसे सोते हैं, जिस करवट सोते हैं, रात भर उसी करवट सोए रहते हैं! आनंद कई रात बैठ कर देखता रहा--यह कैसे होता होगा! स्वाभाविक है उसकी जिज्ञासा। उसने कहा : 'मैंने हर तरह से आपको जांचा। आप जैसे सोते हैं, पैर जिस पैर पर रख लिया, रात भर रखे रहते हैं। आप सोते हैं कि रात में यह भी हिसाब लगाए रखते हैं कि पांव उसी पर रहे, बदले नहीं। करवट नहीं बदलते श! बुद्ध ने कहा : 'आनंद, जब मन शांत हो जाए तो शरीर को अशांत रहने का कोई कारण नहीं रह जाता। ' मुझे कोई चेष्...

तुम भी आनंद की तलाश में कहां-कहां नहीं घूम लिए?

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*कस्तूरी कुंडल बसै* कबीर कहते हैं, कहीं और जाना नहीं है। 'तेरा सांईं तुज्झ में जागि सकै तो जाग' बस करना इतना ही है कि तू जाग। साईं को नहीं खोजना है, जागना है। और भूल कर के कहीं साईं को खोजने मत निकल जाना, बिना जागे; नहीं तो नींद में बहुत भटकोगे, पहुंचोगे कहीं नहीं। क्योंकि--'तेरा साईं तुज्झ में'। जाते कहां हो खोजने? जितनी दूर निकल जाओगे खोजने उतनी ही उलझन में पड़ जाओगे। परमात्मा को खोजना नहीं है, बस जागना है। तेरा साईं तुज्झ में, जागि सकै तो जाग।  कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूढै़ वन माहिं।  आती है गंध कस्तूरी की भीतर से। नाफा पक गया, कस्तूरी तैयार है। भागता है पागल होकर मृग, खोजता है, 'कहां से आती है यह गंध?' उसकी नाभि में है कस्तूरी। पर मृग को कैसे पता चले? मनुष्य को भी पता नहीं चलता कि गंध नाभि में है। तुम्हारे जीवन का स्रोत तुम्हारी नाभि है। तुम्हारे आनंद का स्रोत भी तुम्हारी नाभि है। तुम्हारे अस्तित्व का केन्द्र तुम्हारी नाभि है। अगर तुम अपनी नाभि में उतर जाओ, तो तुमने परमात्मा का द्वार पा लिया। पश्चिम में लोग मजाक करते हैं। पूरब के योगियों को कहते ह...

स्कॉट एडम्स द्वारा लिखित "हाउ टू फेल एट ऑलमोस्ट एवरीथिंग एंड स्टिल विन बिग"

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स्कॉट एडम्स द्वारा लिखित "हाउ टू फेल एट ऑलमोस्ट एवरीथिंग एंड स्टिल विन बिग" एक व्यक्तिगत विकास और सफलता की किताब है जो लेखक के जीवन के अनुभवों से ली गई है, जिसमें हास्य को व्यावहारिक सलाह के साथ मिलाया गया है। एडम्स, जिन्हें डिल्बर्ट के निर्माता के रूप में जाना जाता है, सफलता के लिए अपरंपरागत रणनीतियाँ साझा करते हैं जो विफलता को गले लगाने, लक्ष्यों के बजाय सिस्टम बनाने और व्यक्तिगत ऊर्जा प्रबंधन को प्राथमिकता देने पर ध्यान केंद्रित करती हैं। यहाँ पुस्तक से 10 मान्य बिंदु दिए गए हैं: 1. विफलता सफलता की सीढ़ी है: एडम्स इस बात पर जोर देते हैं कि विफलता न केवल अपरिहार्य है बल्कि सफलता के मार्ग पर आवश्यक भी है। वह अपनी खुद की विफलताओं की व्यक्तिगत कहानियाँ साझा करते हैं और बताते हैं कि प्रत्येक ने उन्हें कुछ मूल्यवान सिखाया, जो अंततः उन्हें सफलता की ओर ले गया। विफलता से डरने के बजाय, एडम्स पाठकों को इसे सीखने और विकास के लिए एक उपकरण के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। 2. लक्ष्य से अधिक प्रणाली: पुस्तक में एक प्रमुख विचार यह है कि लक्ष्य की तुलना में प्रणाली ...

क्यों बूढ़े अतीत में जीते हैं ?

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मनोवैज्ञानिक कहते हैं : जिस दिन से तुम अतीत के संबंध में ज्यादा विचार करने लगो, समझ लेना कि बूढ़े हो गए। बुढ़ापे की यह मनोवैज्ञानिक परिभाषा है। जिस दिन से तुम्हें अतीत के ज्यादा विचार आने लगें और तुम पीछे की बातें करने लगो, कि वे दिन, अब क्या रखा है, अब दुनिया वह दुनिया न रही! बच्चे भविष्य में देखते हैं और बूढ़े अतीत में देखते हैं। बूढ़ा आदमी बैठकर अपनी आरामकुर्सी पर सोचा करता है: वे दिन जब वह डिप्टी कलेक्टर था! अहह! क्या दिन थे वे भी साहबियत के! जहां से निकल जाओ, वहीं नमस्कार—नमस्कार हो जाता था! सब याद आते हैं वे दिन, बड़े इत्र—सुगंध से भरे। सम्मान, सत्कार, डालियां सजी हुई आती थीं। आम के मौसम में आम चले आ रहे हैं। दिन थे मौज के! आगे देखे भी तो क्या? आगे देखने को कुछ है नहीं। आगे तो सब सन्नाटा है। मौत की पगध्वनि सुनाई पड़ रही है। मौत को देखना कौन चाहता है! पीछे की सोचता है कि क्या दिन थे! रुपए का बत्तीस सेर दूध मिलता था, सोलह सेर घी मिलता था, अहा!. ..अब फिर से स्वाद और चटखारे ले लेता है। दिल बाग—बाग हो जाता है। फिर सुगंध आने लगती है पुराने दिनों की। ऐसे अपने को भरमाए रखता है। बूढ़...

सभी वरिष्ठ नागरिकों (50-100 वर्ष और उससे अधिक आयु के) को एक आर्थोपेडिक डॉक्टर का पत्र

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सभी वरिष्ठ नागरिकों (50-100 वर्ष और उससे अधिक आयु के) को एक आर्थोपेडिक डॉक्टर का पत्र *मैं अब अस्थि घनत्व निर्धारित करने की अनुशंसा नहीं करता, क्योंकि बुजुर्ग निश्चित रूप से ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित होंगे, और उम्र के साथ, ऑस्टियोपोरोसिस का स्तर निश्चित रूप से अधिक गंभीर हो जाएगा, और हड्डियों के फ्रैक्चर का जोखिम निश्चित रूप से बढ़ जाएगा।* *एक सूत्र है:* फ्रैक्चर जोखिम = बाहरी क्षति बल / अस्थि घनत्व। *बुजुर्ग लोगों में फ्रैक्चर होने की संभावना होती है क्योंकि हर का मान (हड्डी घनत्व) छोटा होता जा रहा है, इसलिए फ्रैक्चर का जोखिम निश्चित रूप से बढ़ जाएगा।* *इसलिए, फ्रैक्चर को रोकने के लिए वरिष्ठों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम आकस्मिक चोटों को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करना है।* *आकस्मिक चोटों को कैसे कम करें?* *मैंने सात गुप्त चरित्रों को संक्षेप में प्रस्तुत किया है, अर्थात्:* "सावधान रहें, सावधान रहें, अधिक सावधान रहें"! *विशिष्ट उपायों में शामिल हैं:* 1. कुछ उठाने के लिए कभी भी कुर्सी या स्टूल पर खड़े न हों, भले ही स्टूल नीचे हो।  2. बरसात के दिनों में बाहर जाने से...

आकांक्षा को कैसे सीमित रखना चाहिए ? ओशो

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आकांक्षाओं के अनुपात में आदमी गरीब होता है। उसी अनुपात में दुखी होता है। फिर तुम्हारी आकांक्षाएं बहुत है। सुंदरतम देह होनी चाहिए; तो गरीब हो गए, तो कुरुप हो गए। धन होना चाहिए,  तो निर्धन हो गए। महल होना चाहिए, तो जिस मकान में रहते है थे वह झोपड़ा हो गया। झोपड़पट्टी हो गया। एक सुंदर स्त्री होनी चाहिए,  क्लियोपैत्रा जैसी सुंदर हो, कि नुरजहां हो,  कि मुमताज महल हो, बस तुम्हारी स्त्री एकदम कुरुप हो गई। बेढंगी हो गई। तुम्हारा बेटा अलबर्ट आइंस्टीन जैसा बुद्धिमान हो, बस, अड़चन हो गई। अब तुम्हारा बेटा बुद्धू हो गया। अब तुम दुख ही दुख में घिरे जा रहे हो। फिर तुम हिसाब लगा सकते हो। अपनी फेरहिस्त बनाना कि क्या- क्या तुम चाहते हो, जिससे तुम सुखी हो जाओगे ? उसी के कारण तुम दुखी हो।  जरा फेरहिस्त को विदा कर दो, तुम्हारा बेटा तुम्हारा बेटाहै,  अलबर्ट आइंस्टीन से क्या लेना-देना? और अगर तुम किसी से तुलना न करो, और जो आशा नहीं करता; वह तुलना नहीं करता;  तुलना आशा की छाया है--तब तुम्हारा बेटा जैसा है वैसा है।  जरा भी दुख देने वाला नहीं है। कोई कारण दुख का नहीं र...

मौत के बाद, आत्मा क्या अनुभव करती है?

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.      👉✍️  यह जान कर तुम चकित होओगे कि पश्चिम में–ईसाई, यहूदी, मुसलमानों में–ज्यादा भूत-प्रेत होते हैं। इंग्लैंड में जितने भूत-प्रेत होते हैं, उतने दुनिया के किसी देश में नहीं होते। इस पर काफी शोध हुई है, खोजबीन हुई है। परा-मनोविज्ञान ने इस पर काफी अनुसंधान किया है कि क्या कारण है। जहां भी लोगों की देह को कब्र में दबा दिया जाता है वहां भूत-प्रेत ज्यादा होते हैं बजाय उन देशों के जहां उनके शरीर को जला दिया जाता है।          इसलिए तो हमने जलाने की विधि खोजी थी। यह कुछ आकस्मिक नहीं है। यह बड़ी महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी देह को छोड़ कर चला गया है वह कम से कम अड़तालीस घंटे तो अपनी देह के आस-पास घूमता रहता है, अगर देह में उसका जरा भी रस है। कम से कम अड़तालीस घंटे और ज्यादा से ज्यादा तेरह दिन वह अपनी लाश के आस-पास घूमता रहता है। मन नहीं होता उसका छोड़ देने को इस देह को। वह इसमें वापस प्रवेश पाने की चेष्टा करता रहता है। पुराने लगाव! जैसे तुम्हें कोई तुम्हारे घर से बाहर निकाल दे तो तुम एकदम थोड़े ही चले जाओगे कि पीछे लौट कर देखोगे ही नहीं। ...

मन कि पुकार को सुनना क्यों चाहिए?

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✍️✍️मैं एक छोटी सी कहानी कहूंगा। हिमालय की घाटियों में एक चिड़िया निरंतर रट लगाती है--जुहो! जुहो! जुहो! अगर तुम हिमालय गए हो तो तुमने इस चिड़िया को सुना होगा। इस दर्द भरी पुकार से हिमालय के सारे यात्री परिचित हैं। घने जंगलों में, पहाड़ी झरनों के पास, गहरी घाटियों में निरंतर सुनायी पड़ता है--जुहो! जुहो! जुहो! और एक रिसता दर्द पीछे छूट जाता है। इस पक्षी के संबंध में एक मार्मिक लोक-कथा है। किसी जमाने में एक अत्यंत रूपवती पहाडी कन्या थी, जो वर्ड्सवर्थ की लूसी की भांति झरनों के संगीत, वृक्षों की मर्मर और घाटियों की प्रतिध्वनियों पर पली थी। लेकिन उसका पिता गरीब था और लाचारी में उसने अपनी कन्या को मैदानों में ब्याह दिया।  वे मैदान, जहां सूरज आग की तरह तपता है। और झरनों और जंगलों का जहां नाम—निशान भी नहीं। प्रीतम के स्नेह की छाया में वर्षा और सर्दी के दिन तौ किसी तरह बीत गए, कट गए, पर फिर आए सूरज के तपते हुए दिन—वह युवती अकुला उठी पहाड़ों के लिए। उसने नैहर जाने की प्रार्थना की। आग बरसती थी—न सो सकती थी, न उठ सकती थी, न बैठ सकती थी। ऐसी आग उसने कभी जानी न थी। पहाड़ों के झरनों के पास प...

इस अशुद्धि से भरे संसार में कौन विश्रांति को उपलब्ध होता है? ओशो

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हम इस सूत्र को समझने की कोशिश करें। "इस अशुद्धि से भरे संसार में कौन विश्रांति को उपलब्ध होता है? जो ठहर कर अशुद्धियों को बह जाने देता है।" इस संबंध में बुद्ध की एक कहानी मुझे सदा प्रिय रही है, वह मैं आपसे कहूं। यह सूत्र उस पूरी कथा का शीर्षक है। "हू कैन फाइंड रिपोज इन ए मडी वर्ल्ड? बाई लाइंग स्टिल इट बिकम्स क्लियर।' बुद्ध एक पहाड़ के पास से गुजरते हैं। धूप है तेज। गर्मी के दिन। उन्हें प्यास लगी। आनंद से उन्होंने कहा, आनंद, तू पीछे लौट कर जा; अभी-अभी हमने एक नाला पार किया है, तू पानी भर ला! आनंद भिक्षा-पात्र लेकर पीछे गया। कोई दो फर्लांग दूर वह नाला था। जब बुद्ध और आनंद वहां से निकले थे, तो नाला बड़ा स्वच्छ था। जलधार धूप में मोतियों जैसी चमकती थी। छिछला था नाला; कंकड़-पत्थरों पर शोर-गुल की आवाज करता बहता था। पहाड़ी नाला था; स्वच्छ, ताजा जल उसमें था। लेकिन जब आनंद वापस पहुंचा, तो देखा कि कुछ बैलगाड़ियां उसके सामने ही उसमें से गुजर रही हैं और नाला गंदा हो गया। धूल और कीचड़ ऊपर उठ आई। सूखे पत्ते दबे जो जमीन में पड़े थे, वे फैल गए। सारा पानी गंदा हो गया; पीने योग्य ...

क्या ज्यादा बोलना अज्ञानता है?

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#फरीद को किसी ने एक सोने की कैंची भेंट की...फरीद कबीर के जमाने में था। और फरीद और कबीर की मुलाकात हुई थी और बड़ी मीठी मुलाकात हुई थी। क्योंकि दो दिन दोनों साथ रहे, और चुप रहे! एक शब्द न यहां से बोल गया, और न वहां से बोला गया। दोनों गले मिले, दोनों हंसे, दोनों साथ बैठे। स्वागत किया जाकर गांव के बाहर कबीर ने फरीद का और विदा कर आए। लेकिन दो दिन में एक शब्द का लेन-देन न हुआ! और जब शिष्यों ने पूछा दोनों को कि यह क्या माजरा है, हम थक गए, ऊब गए, और हम बड़ी अपेक्षा रखते थे के कि कुछ होगी बात, हम भी सुन लेंगे, कुछ सार मिलेगा; सब दो दिन खराब हुए! फरीद ने कहा, जो बोलता है वह अज्ञानी है। अगर मैं बोलता तो मैं अज्ञानी, और कबीर बोलते तो वे अज्ञानी। कबीर ने अपने शिष्यों से कहा, बोलने को कुछ था नहीं। क्योंकि दोनों हम जानते हैं। और दोनों ने एक को ही जान लिया, कहना, किससे, सुनना किसको? और पुनरुक्ति शोभादायक नहीं। अकारण मेहनत। जहां मैं हूं, वही फरीद है। न मैं हूं, न फरीद है। तुम्हारे लिए हम दो थे, हमारे लिए हम एक हैं। तुम वार्तालाप चाहते थे। और हम वार्तालाप करते तो पागल मालूम पड़ते। क्योंकि वह एक...

बायंग-चुल हान द्वारा लिखित "द बर्नआउट सोसाइटी"

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 समकालीन समाज की एक आलोचनात्मक परीक्षा है, जो बर्नआउट की व्यापक घटना और व्यक्तियों और समुदायों के लिए इसके निहितार्थों पर ध्यान केंद्रित करती है। हान इस बात की पड़ताल करते हैं कि कैसे आधुनिक जीवन, जो अति-व्यक्तिवाद, पूंजीवाद और अथक उत्पादकता की विशेषता रखता है, थकावट और अलगाव की भावनाओं में योगदान देता है। यहाँ पुस्तक से दस प्रमुख सबक और अंतर्दृष्टि दी गई हैं: 1. बर्नआउट संस्कृति का उदय: हान बर्नआउट को समकालीन समाज की एक परिभाषित विशेषता के रूप में पहचानते हैं, जहाँ व्यक्ति उत्पादकता और उपलब्धि की माँगों से अभिभूत हैं। उनका तर्क है कि लगातार प्रदर्शन करने और सुधार करने का दबाव मानसिक और शारीरिक थकावट की ओर ले जाता है। 2. अनुशासन से उपलब्धि की ओर बदलाव: लेखक अतीत के अनुशासनात्मक समाज की तुलना करता है, जो नियमों और बाहरी नियंत्रण की विशेषता रखता है, आज के उपलब्धि-उन्मुख समाज से जो आत्म-अनुकूलन और व्यक्तिगत सफलता पर जोर देता है। इस बदलाव ने प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करने के दबाव को बढ़ा दिया है, जो बर्नआउट में योगदान देता है।  3. अति-व्यक्तिव...

कैसे परमात्मा से-- सीधा मिलना चाहिए।

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एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था। एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ।  उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा : स्वामी,  एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं, कोई उत्तर नहीं मिलता। क्या आप मुझे उत्तर देंगे?  स्वामी ने कहा : निश्चित दूंगा। उस संन्यासी ने उस राजा से कहा : नहीं, आज तुम खाली नहीं लौटोगे, पूछो। उस राजा ने कहा : मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं, ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना--मैं सीधा मिलना चाहता हूं। उस संन्यासी ने कहा : अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर? राजा ने कहा : माफ़ करिए, शायद आप समझे नहीं--मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं; जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो? उस संन्यासी ने कहा : महानुभाव, भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं। अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें। बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो,  राजा ने हिम्मत की, उसने क...

मैं पिछले अनुभवों को कैसे भूल सकता हूँ, और हर व्यक्ति से नए नज़रिए से कैसे मिल सकता हूँ?

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पिछले अनुभवों को भूलकर नए नज़रिए से लोगों से मिलना पिछले अनुभवों को भूलकर हर व्यक्ति से नए नज़रिए से मिलना एक चुनौती हो सकती है, लेकिन इसे विकसित करना एक मूल्यवान कौशल है। आपकी मदद करने के लिए यहाँ कुछ रणनीतियाँ दी गई हैं: ध्यान और ध्यान ध्यान का अभ्यास करें: बिना किसी निर्णय के अपने विचारों और भावनाओं पर ध्यान दें। इससे आपको नकारात्मक पैटर्न को पहचानने और छोड़ने में मदद मिल सकती है। नियमित रूप से ध्यान करें: ध्यान आपके दिमाग को शांत कर सकता है और तनाव को कम कर सकता है, जिससे वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करना आसान हो जाता है। संज्ञानात्मक-व्यवहार तकनीक नकारात्मक विचारों को चुनौती दें: उन नकारात्मक विचार पैटर्न को पहचानें और उनसे सवाल करें जो आपको रोक रहे हैं। कृतज्ञता का अभ्यास करें: अपने जीवन के सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने से आपका नज़रिया बदलने में मदद मिल सकती है। भावनात्मक प्रसंस्करण अपनी भावनाओं को व्यक्त करें: अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के स्वस्थ तरीके खोजें, जैसे कि जर्नलिंग, किसी मित्र से बात करना या थेरेपी लेना। स्वस्थ सीमाएँ निर्धारित करे...

एपिक्टेट द्वारा लिखित, "द आर्ट ऑफ़ लिविंग", में सारगर्भित बातें हैं।

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प्राचीन स्टोइक दार्शनिक की शिक्षाएँ, स्टोइकवाद के सिद्धांतों को एक सद्गुणी और पूर्ण जीवन के लिए मार्गदर्शक के रूप में महत्व देती हैं। एपिक्टेटस, जो एक पूर्व दास थे, दार्शनिक बन गए, सिखाते हैं कि खुशी और शांति इस बात से आती है कि हम बाहरी परिस्थितियों के बजाय अपने आस-पास की दुनिया के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यहाँ पुस्तक से दस प्रमुख सबक और अंतर्दृष्टि दी गई हैं: 1. उस पर ध्यान केंद्रित करें जिसे आप नियंत्रित कर सकते हैं: एपिक्टेटस के दर्शन के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि हमारे नियंत्रण में क्या है और क्या नहीं है, इसके बीच अंतर है। वह सिखाता है कि हमें अपनी ऊर्जा अपने विचारों, कार्यों और प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित करनी चाहिए, जबकि यह स्वीकार करना चाहिए कि बाहरी घटनाएँ और अन्य लोगों के कार्य हमारे प्रभाव से परे हैं। यह दृष्टिकोण लचीलापन और मन की शांति को बढ़ावा देता है। 2. सद्गुण का महत्व: एपिक्टेटस इस बात पर जोर देते हैं कि सच्ची खुशी नैतिक मूल्यों के साथ एक सद्गुणी जीवन जीने से आती है।  सद्गुण - जिसमें बुद्धि, साहस, न्याय और संयम शामिल हैं - एक सार्थक अस्...

कैसे तुम अगर जीवन की छोटी—छोटी चीजों में रस लेने लगो, तो संतुष्ट हो जाओ ?

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मैं असंतुष्ट हूं; हर बात से असंतुष्ट। और कभी—कभी सोचता हूं कि शायद आनंद मेरे भाग्य में ही नहीं।       ऐसा आदमी ही कभी नहीं हुआ कि आनंद जिसके भाग्य में न हो। हालाकि ऐसे आदमी करोड़ों हैं जो आनंद को अनुभव नहीं कर पाते। लेकिन भाग्य को दोष मत देना। यह अपना दोष भाग्य के कंधों पर मत फेंको। यह तरकीब मत करो। दोषी तुम हो, भाग्य नहीं। तुम्हारे भाग्य के तुम ही निर्माता हो।       तुम असंतुष्ट हो तो अपने असंतोष को समझने की कोशिश करो कि क्यों असंतुष्ट हूं। तुम कारण खोज लोगे। उन कारणों को मत दोहराओ, असंतोष खो जाएगा। लेकिन कारण तुम खोजना नहीं चाहते। क्योंकि हो सकता है कारण तुम्हीं होओ, तुम्हारा होना ही कारण हो;यह तुम्हारा मैं जो संतुष्ट होना चाहता है, यही कारण हो;तो तुम उस खतरे को मोल नहीं लेना चाहते हो किसी पर दोष डाल दो।       आदमी सदियों से दोष टालता रहा है। बहाने बदल लेता है, लेकिन दोष टालता है। पहले कहता था तो भाग्य। तुम पुराने ढंग के आदमी मालूम होते हो— भाग्य, भगवान! फिर लोग बदले, लेकिन कुछ ज्यादा नहीं बदले। मार्क्स ने कहा कि अगर तुम दुखी हो,...

"ब्रेन वॉश: डिटॉक्स योर माइंड फॉर क्लियर थिंकिंग, डीप रिलेशनशिप्स, एंड लास्टिंग हैप्पीनेस"

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डेविड पर्लमटर, एम.डी. और ऑस्टिन पर्लमटर, एम.डी. द्वारा लिखित "ब्रेन वॉश: डिटॉक्स योर माइंड फॉर क्लियर थिंकिंग, डीप रिलेशनशिप्स, एंड लास्टिंग हैप्पीनेस" एक संपूर्ण जीवन प्राप्त करने में मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक कल्याण के महत्व के बारे में एक सम्मोहक तर्क प्रस्तुत करता है। लेखक इस बात का पता लगाते हैं कि आधुनिक समाज की जीवनशैली के विकल्प हमारे मस्तिष्क को कैसे प्रभावित करते हैं और नकारात्मक प्रभावों को उलटने के लिए रणनीतियाँ प्रदान करते हैं। यहाँ पुस्तक से दस प्रमुख सबक और अंतर्दृष्टि दी गई हैं: 1. ब्रेनवॉशिंग की अवधारणा: लेखक इस विचार को प्रस्तुत करते हैं कि हमारा मस्तिष्क बाहरी प्रभावों, जैसे कि सोशल मीडिया, अस्वास्थ्यकर आहार और तनावपूर्ण जीवनशैली द्वारा "ब्रेनवॉशिंग" के अधीन है। यह ब्रेनवॉशिंग स्पष्ट सोच और भावनात्मक लचीलेपन की हमारी क्षमता को कम करता है। इन प्रभावों को पहचानना मानसिक स्पष्टता को पुनः प्राप्त करने का पहला कदम है। 2. मस्तिष्क और आंत के बीच संबंध: पुस्तक आंत-मस्तिष्क संबंध पर जोर देती है, इस बात पर प्रकाश डालती है कि हम जो खाते हैं ...

कैसे व्यक्तित्व एक झूठी चीज़ है ?

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प्रिय ओशो, हालाँकि आप मुझे  व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते,  फिर भी सब कुछ घट रहा है।  यह कैसे संभव है? "मैं किसी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन मैं सभी को मूल रूप से जानता हूँ,मैं सभी को आध्यात्मिक रूप से जानता हूँ।" व्यक्तित्व एक झूठी चीज़ है। यह एक मुखौटा है:  तुम्हारा नाम, तुम्हारा पता, तुम्हारा पेशा, तुम्हारी तस्वीर -- पासपोर्ट साइज़ -- तुम्हारा पहचान पत्र।  आपका व्यक्तित्व किससे बना है? -- बस इसी तरह की चीज़ों से।  अन्यथा तुम बिना किसी नाम, बिना किसी पते, बिना किसी धर्म, बिना किसी देश, बिना किसी जाति के दुनिया में आते हो। तुम बस एक कोरा कागज के रूप में आते हो -- एकदम साफ़, स्पष्ट, क्रिस्टल क्लियर।  यही तुम्हारी वास्तविकता है।  लेकिन यही सभी की वास्तविकता भी है, इसलिए इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं तुम्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ या नहीं।  सभी व्यक्तित्व झूठे हैं।  और तुम्हारे भीतर का मूल अस्तित्व एक ही है। जिस दिन मैंने खुद को जाना, मैंने तुम्हें भी जान लिया।  इसीलिए इतना कुछ घट रहा है। मैं तुम्हारी उलझन, ...