क्या ज्यादा बोलना अज्ञानता है?
#फरीद को किसी ने एक सोने की कैंची भेंट की...फरीद कबीर के जमाने में था। और फरीद और कबीर की मुलाकात हुई थी और बड़ी मीठी मुलाकात हुई थी। क्योंकि दो दिन दोनों साथ रहे, और चुप रहे! एक शब्द न यहां से बोल गया, और न वहां से बोला गया। दोनों गले मिले, दोनों हंसे, दोनों साथ बैठे। स्वागत किया जाकर गांव के बाहर कबीर ने फरीद का और विदा कर आए। लेकिन दो दिन में एक शब्द का लेन-देन न हुआ! और जब शिष्यों ने पूछा दोनों को कि यह क्या माजरा है, हम थक गए, ऊब गए, और हम बड़ी अपेक्षा रखते थे के कि कुछ होगी बात, हम भी सुन लेंगे, कुछ सार मिलेगा; सब दो दिन खराब हुए!
फरीद ने कहा, जो बोलता है वह अज्ञानी है। अगर मैं बोलता तो मैं अज्ञानी, और कबीर बोलते तो वे अज्ञानी। कबीर ने अपने शिष्यों से कहा, बोलने को कुछ था नहीं। क्योंकि दोनों हम जानते हैं। और दोनों ने एक को ही जान लिया, कहना, किससे, सुनना किसको? और पुनरुक्ति शोभादायक नहीं। अकारण मेहनत। जहां मैं हूं, वही फरीद है। न मैं हूं, न फरीद है। तुम्हारे लिए हम दो थे, हमारे लिए हम एक हैं। तुम वार्तालाप चाहते थे। और हम वार्तालाप करते तो पागल मालूम पड़ते। क्योंकि वह एकालात होता। दूसरा था नहीं, बात किससे होती?
दो अज्ञानी मिलें, बात हो सकती है; खूब होती है। एक ज्ञानी और एक अज्ञानी मिलें, तो भी बात हो सकती है; समझ में बहुत नहीं आती है। लेकिन दो ज्ञानी मिलें तो कैसी बात! बात बिलकुल नहीं होती, और सब समझ में आता है। सुना एक शब्द नहीं जाता और सब समझ में आता है। और दो अज्ञानी खूब चर्चा करते हैं; सुना बहुत जाता है, शोरगुल बहुत मचता है, समझ में कुछ भी नहीं आता।
एक ज्ञानी और एक अज्ञानी की भी वार्ता होती है। अगर अज्ञानी राजी हो, तो उस वार्ता से कुछ फल मिल कसता है। अगर अज्ञानी थोड़ा खुला हो, अगर अज्ञानी में थोड़ा हृदय हो, सिर्फ बुद्धि न हो, तो कोई बीज हृदय में अंकुरित हो सकते हैं।
फरीद को किसी ने एक सोने की कैंची भेंट की। फरीद ने कहा, माफ करो, कैंची का हम क्या करेंगे? काटने का हम धंधा करते ही नहीं, हमारा धंधा जोड़ने का है। अगर तुम कुछ देना ही चाहते हो, एक सुई-धागा ले आओ।
संतों का धंधा ही जोड़ने का है। हृदय का धंधा जोड़ने का है। बुद्धि का धंधा तोड़ने का है। पंडित तोड़ते हैं, संत जोड़ते हैं। दुनिया इतनी टूटी है पंडितों के कारण—तीन सौ धर्म हैं, पंडितों के कारण। पंडित भेद निकालता है, बारीक भेद निकालता है। संत अभेद को खोजते हैं। दो के बीच जो जोड़नेवाला है, उसको खोजते हैं। पंडित दो के बीच जो तोड़नेवाला है, उसको खोजते हैं। इसलिए वास्तविक विरोध संत और असंत के बीच नहीं है, संत और पंडित के बीच है। संत और पापी के बीच वास्तविक विरोध नहीं है; संत और पंडित के बीच वास्तविक विरोध है।
धर्मों का जन्म होता है संतों से, और विनाश होता है पंडितों से। और जैसे ही जन्म होता है धर्म का, वैसे ही पंडित हावी हो जाते हैं।
तुम्हारे भीतर साधुता का तत्व है हृदय, क्यों? क्योंकि हृदय तुम्हारे भीतर अप्रशिक्षित है। बुद्धि का तो प्रशिक्षण हुआ। बुद्धि को समाज ने तैयार किया है, हृदय को परमात्मा ने। हृदय को शिक्षित करने के कोई उपाय नहीं हैं, कोई विश्वविद्यालय भी नहीं, जहां तुम्हारे हृदय की शिक्षा हो सके। प्रेम के प्रशिक्षण का आज तक कोई मार्ग नहीं खोता जा सका, और धन्यभागी हैं हम कि मार्ग नहीं खोजा जा सका। जिस दिन खोज लिया जाएगा, उससे बड़ा कोई दुर्भाग्य न होगा। उस दिन फिर तुम मशीन हो जाओगे। तुम्हारी बुद्धि तो यंत्र हो ही गई है, तुम्हारा हृदय थोड़ा सा यंत्र नहीं है। तुम्हारी धड़कन में अभी भी प्रकृति धड़कती है। परमात्मा थोड़े स्वर देता है। तुम्हारी बुद्धि तो बिलकुल यांत्रिक है और समाज द्वार निर्मित है।
बुद्धि से तुम परमात्मा तक न जा सकोगे, इसीलिए तो शास्त्र से कोई कभी वहां नहीं पहुंचता। हृदय से पहुंचता है, प्रेम से, प्रार्थना से, आस्था से। जब साधु की बात कहीं जा रही है, तब तुम्हारे हृदय को निवेदन किया जा रहा है। संबोधित है तुम्हारा हृदय। तो जो यहां कहें, उसे तुम सोचना मत, सिर्फ समझना। हृदय समझता है, बुद्धि सोचती है, और दोनों में कोई तालमेल नहीं है। बुद्धि बड़ा तर्क करती है, हृदय देखता है। हृदय के पास आंख है, बुद्धि अंधे का टटोलना है। बुद्धि अंधे की लकड़ी है, जिससे वह टटोलता है कि रास्ता कहां है। हृदय देखता है, टटोलने की कोई जरूरत नहीं तर्क व्यर्थ है, हृदय को दिखाई पड़ता है, वह निकल जाता है।
सुनो भाई साधो का अर्थ है—हृदय से सुनो; सादगी से सुनो; तर्क और विचार से नहीं, भाव और प्रेम से सुनो! वही समझ पाएगा।
ओशो; सुनो भाई साधो
संकलन:डी जी शास्त्री
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