आकांक्षा को कैसे सीमित रखना चाहिए ? ओशो
आकांक्षाओं के अनुपात में आदमी गरीब होता है। उसी अनुपात में दुखी होता है। फिर तुम्हारी आकांक्षाएं बहुत है। सुंदरतम देह होनी चाहिए; तो गरीब हो गए, तो कुरुप हो गए। धन होना चाहिए, तो निर्धन हो गए। महल होना चाहिए, तो जिस मकान में रहते है थे वह झोपड़ा हो गया। झोपड़पट्टी हो गया। एक सुंदर स्त्री होनी चाहिए, क्लियोपैत्रा जैसी सुंदर हो, कि नुरजहां हो, कि मुमताज महल हो, बस तुम्हारी स्त्री एकदम कुरुप हो गई। बेढंगी हो गई। तुम्हारा बेटा अलबर्ट आइंस्टीन जैसा बुद्धिमान हो, बस, अड़चन हो गई। अब तुम्हारा बेटा बुद्धू हो गया। अब तुम दुख ही दुख में घिरे जा रहे हो। फिर तुम हिसाब लगा सकते हो। अपनी फेरहिस्त बनाना कि क्या- क्या तुम चाहते हो, जिससे तुम सुखी हो जाओगे ? उसी के कारण तुम दुखी हो।
जरा फेरहिस्त को विदा कर दो, तुम्हारा बेटा तुम्हारा बेटाहै, अलबर्ट आइंस्टीन से क्या लेना-देना? और अगर तुम किसी से तुलना न करो, और जो आशा नहीं करता; वह तुलना नहीं करता; तुलना आशा की छाया है--तब तुम्हारा बेटा जैसा है वैसा है।
जरा भी दुख देने वाला नहीं है। कोई कारण दुख का नहीं रह गया। तुम्हारे पास दस हजार रूपये हैं, तो तुम दस हजार से जो सुख ले सकते हो, लोगे। क्योंकि ऐसे लोग है बहुत, जिनके पास दस रुपये भी नहीं हैं। और जिनके पास दस रुपये नहीं हैं, वे सोचते हैं, दस हजार हो जाएं तो सुखी हो जाएंगे। और तुम जरा सोचो, तुम्हारे पास दस हजार हैं, मगर तुम सुखी कहां हो? और तुम सोचते हो, दस अरब हो जाए तो हम सुखी हो जाएंगे--तो एण्ड्रू कारनेगी का विचार करना। एंण्ड्रू कारनेगी के पास दस अरब रुपये हैं, सुखी कहां है?
तुम्हारी तुलनाओं को विदा करके देखो और तुम अचानक पाओगे, दुख के पहाड़ कट गए, छंट गए।
बुध्द ने कहा है : तृष्णा दुख का मूल है। तो एक बात--तृष्णा जितनी बड़ी होगी, उतना बड़ा दुख होता चला जाता है।
दूसरी बात--तुम अगर तृष्णाओं को किसी तरह पूरी भी कर लो, सारी जिंदगी दुख उठा-उठा कर, नरक झेल-झेल कर, भीख मांग-मांग कर, चोरी करके, बेईमानी करके, सब तरह की जालसाजियां करके किसी तरह तुम महल में पहुंच जाओ, तो भी तुम सुखी न हो सकोगे। क्योंकि वासना का दूसरा रंग भी समझ लो।
जो मिल जाती है, वासना उसी को भूल जाती है। जो नहीं मिलती उसी को याद रखती है। दस हजार है तो लाख की मांग करती हैं। जब लाख हो जाएंगे तो दस लाख की मांग करेगी। तुम्हारा और तुम्हारी वासना का अंतर सदा उतना ही रहता है जितना पहले था-उसमें अंतर नहीं पड़ता। वासना और मनुष्य के बीच जो संबंध है, वह क्षितिज जैसा है। जैसे दूर पास ही कुछ मील चलकर आकाश जुड़ता हुआ लगता है पृथ्वी से।
तुम सोचते हो घंटे दो घंटे चलूंगा तो पहुंच जाउंगा जहां आकाश जमीन से मिलता है। या बहुत होगा तो सांझ, सुबह चलूंगा तो सांझ तक पहुंच जाऊंगा। मगर तब तुम कभी नहीं पहुंच पाओगे क्योंकि जितने तुम आगे बढ़ जाओगे उतना ही क्षितिज आगे बढ़ जाता है। क्षितिज कहीं है ही नहीं, सिर्फ आभास है।
ऐसे ही तुम्हारी वासना बढ़ती जाती है। तुम झोपड़े में हो, तो मकान मांगती है; मकान में होते हो तो महल मांगती है, महल में हो जाते हो, और बड़ा महल मांगती है। वासना का अर्थ है, और... और...और... । वह वासना का स्वरुप है। वह कभी भी नहीं कहती कि बस, पर्याप्त। पर्याप्त शब्द वासना को आता ही नहीं। वह उसकी भाषा में नहीं है।
ओशो
संकलन: डी जी शास्त्री
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