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निषेध का आकर्षण

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#तिब्बत में एक फकीर था, मिलारेपा। उसके पास एक युवक आया और उसने कहा कि मुझे कोई मंत्र सिद्धि करनी है, मुझे कोई शक्ति अर्जित करनी है, मुझे कोई मंत्र दे दें। मिलारेपा ने कहा कि मंत्र हमारे पास कहां! हम तो फकीर हैं। मंत्र तो जादूगरों के पास होते हैं, मदारियों के पास होते हैं, तुम उनके पास जाओ। हमारे पास मंत्र कहां? हमारे पास सिद्धि का क्या संबंध? लेकिन वह युवक जितना ही उस साधु ने मना किया, उतना ही उस युवक को लगा कि जरूर यहां कुछ होना चाहिए, इसीलिए यह मना करता है। जितना साधु रोकने लगा और इनकार करने लगा उतना ही वह युवक साधु के पास जाने लगा। जो साधु डंडे से किन्हीं को भगाते हैं, उनके पास बहुत भीड़ इकट्ठी हो जाती है। जो गाली देते हैं और पत्थर मारते हैं, उनके पास भीड़ और बढ़ जाती है। क्योंकि जरूर यहां कुछ होना चाहिए, नहीं तो यह पत्थर मारेगा और डंडे मारेगा? लेकिन हमें पता नहीं है कि चाहे अखबार में खबर निकलवा कर बुलावाया जाए लोगों को, चाहे पत्थर मार कर, तरकीब एक ही है, प्रोपेगेंडा दोनों में ही एक है। और दूसरी तरकीब ज्यादा कनिंग से भरी है। जब पत्थर मार कर लोगों को भगाया जाए, तो लोगों के य...

जेफ बेजोस ने एक सरल नियम के साथ Amazon का निर्माण किया

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जेफ बेजोस ने एक सरल नियम के साथ Amazon का निर्माण किया: “अगर दो पिज्जा टीम को नहीं खिला सकते हैं, तो यह बहुत बड़ी बात है।” मैंने हाल ही में यह सीखा, और इसने टीमवर्क के बारे में मेरी सोच को पूरी तरह से बदल दिया। यहां बताया गया है कि यह आपके व्यवसाय को कैसे बदल सकता है।  🍕🍕 "टू पिज़्ज़ा रूल" ने अमेज़ॅन की नवाचार और विकास की संस्कृति को आकार दिया: टू-पिज़्ज़ा रूल बेजोस के इस विश्वास पर आधारित है कि छोटी, स्वायत्त टीमें बड़ी, नौकरशाही वाली टीमों की तुलना में अधिक उत्पादक होती हैं। इसका क्या मतलब है? छोटी टीमें बेहतर काम करती हैं। बस। यहाँ कारण है: 👉 तेज़ निर्णय: अनुमोदन के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। 👉 स्पष्ट संचार: कम लोग, कम भ्रम। 👉 उच्च जवाबदेही: हर कोई सार्थक रूप से योगदान देता है। टीमों के आकार को सीमित करके, बेजोस ने सुनिश्चित किया कि प्रत्येक सदस्य सार्थक रूप से योगदान दे और "समूह-विचार" और अति-जटिलता के नुकसान से बचा जाए। Amazon की संरचना "टू-पिज़्ज़ा टीम" के इर्द-गिर्द घूमती है।  प्रत्येक टीम इतनी छोटी होती है कि दो पिज्जा खाए जा स...

*ध्यानी का आहार* कैसा होता है?

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मनुष्य एक अकेली प्रजाति है जिसका आहार अनिश्चित है। अन्य सभी जानवरों का आहार निश्चित है। उनकी बुनियादी शारीरिक जरूरतें और उनका स्वभाव फैसला करता है के वे क्या खाते हैं और क्या नहीं; कब वे खाते हैं और कब उन्हें नहीं खाना होता है। किन्तु मनुष्य का व्यवहार बिलकुल अप्रत्याशित है, वह बिल्कुल अनिश्चितता में जीता है। न ही तो उसकी प्रकृति उसे बताती है कि उसे कब खाना चाहिए, न उसकी जागरूकता बताती है कि कितना खाना चाहिए, और न ही उसकी समझ फैसला कर पाती है कि उसे कब खाना बंद करना है| अब जब इनमे से कोई भी गुण निश्चित नहीं है तो मनुष्य का जीवन बड़ी अनिश्चित दिशा में चला गया है। लेकिन अगर मनुष्य थोड़ी सी भी समझदारी दिखाए, अगर थोड़ी सी बुद्धि से जीने लगे, थोड़ी सी विचारशीलता के साथ, थोड़ी सी अपनी आँखें खोल ले, तो सही आहार का निर्णय लेना बिलकुल कठिन नहीं होगा. यह बहुत आसन है; इससे आसन कुछ हो भी नहीं सकता। सही आहार को समझने के लिए हम इसे दो हिस्सों में बाँट सकते हैं। पहली बात: मनुष्य क्या खाए और क्या न खाए? मनुष्य का शरीर रासायनिक तत्वों से बना है, शरीर की पूरी प्रक्रिया रासायनिक है। अगर मनुष्...

सद्गुरु द्वारा लिखित "कर्म: ए योगीज़ गाइड टू क्राफ्टिंग योर डेस्टिनी"

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सद्गुरु द्वारा लिखित "कर्म: ए योगीज़ गाइड टू क्राफ्टिंग योर डेस्टिनी" कर्म की अवधारणा की गहन खोज है, जो इस बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है कि हमारे कार्य हमारे जीवन और अनुभवों को कैसे आकार देते हैं। सद्गुरु कर्म को न केवल नैतिक प्रतिशोध की प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करते हैं, बल्कि कार्यों, विचारों और इरादों के एक जटिल अंतर्संबंध के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो हमारे वर्तमान और भविष्य की वास्तविकताओं को प्रभावित करते हैं। यहाँ पुस्तक से दस प्रमुख सबक और अंतर्दृष्टि दी गई हैं: 1. कर्म को समझना: सद्गुरु कर्म को अतीत से संचित छापों और कार्यों के रूप में परिभाषित करते हैं जो हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं। वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कर्म केवल अच्छे और बुरे कर्मों के बारे में नहीं है; यह सभी कार्यों, विचारों और भावनाओं को शामिल करता है, जो हमारे अनुभवों और पहचानों को आकार देता है। 2. अपने जीवन के लिए ज़िम्मेदारी: पुस्तक का एक केंद्रीय विषय व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है। सद्गुरु जोर देते हैं कि व्यक्तियों के पास अपनी पसंद और कार्यों के माध्यम से अपने भा...

पता हो तुम कौन हो; कहां हो! कहां जा रहे हो?

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🌄मनुष्य चेतना के दो आयाम हैं एक मूर्च्छा, एक अमूर्च्छा मूर्च्छा का अर्थ है: सोए-सोए जीना बिना होश के जीना अमूर्च्छा का अर्थ है होशपूर्वक जीना जाग्रत, विवेकपूर्ण मूर्च्छा का अर्थ है: भीतर का दीया बुझा है। अमूर्च्छा का अर्थ है भीतर का दीया जला है। मूर्च्छा में रोशनी बाहर होती है बाहर की रोशनी से ही आदमी चलता है। जहां इंद्रियां ले जाती हैं, वहीं जाता है। इंद्रियों की कामना ही खुद की कामना बन जाती है। क्योंकि खुद का कोई पता ही नहीं मन जो सुझा देता है, वही जीवन की शैली हो जाती है क्योंकि अपने स्वरूप का तो कोई बोध नहीं लोग जो समझा देते हैं, समाज जो बता देता है, वहीं आदमी चल पड़ता है, क्योंकि न तो अपनी कोई जड़ें होती हैं अस्तित्व में, न अपना भान होता है। मैं कौन हूं. इसका कोई पता ही नहीं। तो जीवन ऐसे होता है, जैसे नदी में लकड़ी का टुकड़ा बहता है। जहां लहरें ले जाती हैं, चला जाता है। जहां धक्के हवा के पहुंचा देते हैं, वहीं पहुंच जाता है। अपना कोई व्यक्तित्व नहीं, निजता नहीं जीवन एक भटकन है। निश्चित ही ऐसी भटकन में कभी मंजिल नहीं आ सकती। मंजिल तो सुविचारित कदमों से पूरी करनी पड़ती ...

कैसे मैं भगवान के दर्शन करु?

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*कल्पित भगवान*  कल्पना भीतर बैठी है, नशे की हालत में और जल्दी साकार हो जाती है। इसलिए दुनिया भर में साधु नशा करते रहे, यह आकस्मिक नहीं है, यह एक्सिडेंटल नहीं है। कल्पना को बल देने में नशा बड़ा सहयोगी है। जो लोग नशा नहीं करते रहे, वे लोग उपवास करते रहे हैं। और यह बात जान लेना जरूरी है। दो ही तरह के वर्ग हैं दुनिया में साधुओं के, या तो नशा करने वाला या उपवास करने वाला। और आप हैरान होंगे, जो काम नशे से होता है वही उपवास से भी हो जाता है। नशे से कुछ मादक द्रव्य शरीर में पहुंच जाते हैं, जो चित्त के होश को कम कर देते हैं। होश कम हो जाता है तो कल्पना जल्दी से साकार होने लगती है। बेहोशी में कल्पना साफ दिखाई पड़ने लगती है। बेहोशी में विचार बिलकुल नहीं रह जाता, इसलिए यह खयाल भी नहीं उठता कि जो मैं देख रहा हूं वह सच है या झूठ, यह विचार भी पैदा नहीं होता, जो दिखता है सच मालूम होता है। सपने में रोज आप देखते हैं, सपना कभी आपको सपने के भीतर झूठ मालूम पड़ता है? कभी आपको ऐसा लगा कि यह मैं सपना देख रहा हूं, यह झूठ है? जागने पर लगता होगा, लेकिन सपने के भीतर सभी सपने सच मालूम पड़ते हैं। क्योंक...

क्या है,बुढ़ापे में पछतावे का कारण बनने वाली चीजें?

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जब हम छोटे होते हैं, तो हम भविष्य को ध्यान में रखे बिना कई तरह के फैसले लेते हैं। कभी-कभी ये फैसले हमें आधी उम्र में परेशान करते हैं। ये कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनका पछतावा हमें बड़े होने पर हो सकता है। 1. गलत व्यक्ति से शादी करना जब आप युवा हों, तो शादी करने के अपने मकसद पर ध्यान दें। अपने साथियों की नकल करने, या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए या दबाव में आकर शादी न करें। प्यार और साथ के लिए शादी करें, सही व्यक्ति से शादी करें, अपने सबसे अच्छे दोस्त से शादी करें। क्योंकि अगर आप गलत व्यक्ति से या गलत कारणों से शादी करते हैं, तो आपको अपनी बाकी की जिंदगी उस व्यक्ति के साथ गुजारनी होगी। आप दोनों के बीच चीजें खराब हो सकती हैं; फिर अवसाद, शारीरिक शोषण, अफेयर, दर्द, शर्म, कोर्ट केस, कड़वाहट आपके मध्य जीवन के वर्षों को परिभाषित करेंगे क्योंकि आपने गलत व्यक्ति को चुना है। जब बच्चे शामिल होंगे तो चीजें और खराब हो जाएंगी। जब आप युवा हों, तो जीवनसाथी का सही चुनाव करें। 2. वे अवसर जिन्हें आपने भुनाया नहीं जब आप युवा होंगे, तो कई दरवाजे खुलेंगे, आपको कई मौके मिलेंगे।  कई युवा लोग डर, आलस्य या...

कपालभाती यह केवल एक प्राणायाम ही नही ।

कपालभाती यह केवल एक प्राणायाम ही नही, बल्कि एक शुद्धी क्रिया भी है, डॉ घोसालकर MBBS ने कपालभाती के विषय में अच्छी जानकारी दी है  कपालभाति एक तेज़ गति वाला श्वास व्यायाम है . यह हठ योग की एक विधि है. कपालभाति शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है - कपाल और भाति. कपाल का मतलब होता है माथा या ललाट और भाति का मतलब होता है तेज. इस प्राणायाम को करने से मस्तिष्क साफ़ होता है और शरीर में ऊर्जा बढ़ती है. कपालभाति के कुछ फ़ायदे ये रहे: कपालभाति करने से पेट की चर्बी कम हो है.     यह पाचन शक्ति को बेहतर बनाता है.     इससे दिल का स्वास्थ्य अच्छा रहता है.     यह नसों को मज़बूत करता है.     यह तनाव कम करने में मदद करता है.     यह गैस, एसिडिटी, कब्ज़ जैसी समस्याओं में भी राहत देता है.    कपालभाति करने का तरीका: रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए, आराम से बैठ जाएं. हाथों को आकाश की ओर, आराम से घुटनों पर रखें. एक लंबी गहरी सांस अंदर लें. सांस छोड़ते हुए अपने पेट को अंदर की ओर खींचें. पेट की मांसपेशियों के सिकुड़ने क...