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कैसे मनुष्य का मन, उसका मस्तिष्क एक रुग्ण घाव की तरह निर्मित हो गया है?

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मेरे प्रिय आत्मन्! मनुष्य का मन, उसका मस्तिष्क एक रुग्ण घाव की तरह निर्मित हो गया है। वह एक स्वस्थ केंद्र नहीं है, एक अस्वस्थ फोड़े की भांति हो गया है। और इसीलिए हमारा सारा ध्यान मस्तिष्क के आस-पास ही घूमता रहता है। शायद आपको यह खयाल न आया हो कि शरीर का जो अंग रुग्ण हो जाता है, उसी अंग के आस-पास हमारा ध्यान घूमने लगता है। अगर पैर में दर्द हो तो ही पैर का पता चलना शुरू होता है और पैर में दर्द न हो तो पैर का कोई भी पता नहीं चलता। हाथ में फोड़ा हो तो उस फोड़े का पता चलता है। फोड़ा न हो तो हाथ का कोई पता नहीं चलता है। हमारा मस्तिष्क जरूर किसी न किसी रूप में रुग्ण हो गया है, क्योंकि चौबीस घंटे हमें मस्तिष्क का ही पता चलता है और किसी चीज का कोई पता नहीं चलता। शरीर जितना स्वस्थ होगा, उतना ही उसका बोध नहीं होगा। जो अंग अस्वस्थ होता है, उसी का बोध होता है। मस्तिष्क का ही हमें बोध होता है शरीर में, उसके आस-पास ही हमारी चेतना घूमती है और जानती है और पहचानती है। जरूर वहां कोई रुग्ण घाव पैदा हो गया है। इस रुग्ण घाव से मुक्त हुए बिना, मस्तिष्क की इस अत्यंत अशांत और तनाव से भरी हुई स्थिति...

क्या मनुष्य ओशो को समझने को तैयार है???

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टॉम रॉबिन्स एक प्रसिद्ध अमरिकी उपन्यासकार हैं जिनके कुछ उपन्यासों का हॉलिवुड में फिल्मांतरण भी किया गया है। 1987 में उन्होंने डॉ. जॉर्ज मेरेडिथ द्वारा ओशो पर लिखी पुस्तक, 'भगवान: दि मोस्ट गॉडलैस यैट दि मोस्ट गॉडली आफ मैन, की भूमिका लिखी थी। उसी भूमिका को उन्होंने अपनी पुस्तक 'वाइल्ड डँक्स फ्लाइंग बैकवर्ड' में एक टिप्पणी के साथ सम्मिलित किया है। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक से यह संपूर्ण आलेख: मैं ओशो का शिष्य नहीं हूँ। मैं किसी भी गुरु का शिष्य नहीं हूँ। बल्कि मैं तो मानता हूँ कि पूर्वीय गुरु व्यवस्था पश्चिम में चेतना के विकास में उपयोगी नहीं है।जबकि इस बात को मानने वाला भी मैं पहला होउंगा कि जो 'उपयोगी' होता है वह सदा महत्वपूर्ण नहीं होता। जिस प्रकार का व्यक्तिवादी होने का मैं दावा करता हूँ उसके साथ गुरत्व का थोडा-सा भी मेल नहीं बैठता। लेकिन हां, यदि मुझे अपनी आत्मा किसीको सौंपनी ही हो तो मैं किसी राजनैतिक पार्टी या किसी मनोविश्लेषक की बजाय ओशो जैसे किसी को सौंपना चाहूँगा। तो, मैं कोई संन्यासी नहीं हूँ। लेकिन जब कोई हरी बयार मेरे द्वार-दरवाजों को झकझोर जाए त...

भगवद् गीता के साथ अशांत समय का सामना करना

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युद्ध के मैदान में ही कृष्ण ने अर्जुन को पढ़ाना शुरू किया था। जब सब कुछ ठीक था, तब उन्होंने उसे नहीं पढ़ाया, क्योंकि अर्जुन सुनने के लिए तैयार नहीं था; उसे लगा कि कृष्ण सिर्फ़ उसके दोस्त हैं। लेकिन जब अशांत समय आया, तो ज्ञान और बुद्धि ज़रूरी हो गई, क्योंकि शांति, स्थिरता और मन की स्पष्टता चीज़ों को उसी तरह समझने और समझदारी से काम लेने के लिए ज़रूरी थी। सबसे पहले, हमें पहचानना और स्वीकार करना चाहिए कि यह एक अशांत समय है। जब हम अशांत समय को नकारते हैं, तो हम एक स्वप्नलोक में रहते हैं और समाधान खोजने में असमर्थ होते हैं। पहला कदम पहचानना है, और दूसरा स्वीकार करना है। किसी स्थिति को स्वीकार करने से मन शांत होता है। पहले तो अर्जुन ने स्थिति को स्वीकार नहीं किया। वह ज़मीन पर बैठ गया और काँपने लगा - सुपरहीरो, जिसने अपने जीवन में कभी रोया नहीं था, कृष्ण के सामने रो पड़ा और कहने लगा, "मैं लड़ नहीं सकता।" कृष्ण ने कहा, "चलो! अपने दिल से यह कमज़ोरी निकाल दो।  अपने ऊपर लगे भावनात्मक बोझ को उतार फेंको। उठो।” कृष्ण ने अर्जुन के अहंकार को बढ़ाते हुए कहा, “तुम इस स्थिति को स...

सकारात्मक मानसिकता की शक्तिलेखक: जेसन वॉल्बर्स

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जेसन वॉल्बर्स जीवन के विभिन्न पहलुओं, जिसमें व्यक्तिगत विकास, रिश्ते और पेशेवर सफलता शामिल है, में सकारात्मक मानसिकता विकसित करने के परिवर्तनकारी प्रभावों की खोज करते हैं। वॉल्बर्स शोध, उपाख्यानों और व्यावहारिक रणनीतियों को मिलाकर यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे सकारात्मक दृष्टिकोण बेहतर परिणामों और समग्र कल्याण की ओर ले जा सकता है। यहाँ पुस्तक से दस प्रमुख सबक और अंतर्दृष्टि दी गई हैं: 1. सकारात्मक मानसिकता की नींव: वॉल्बर्स इस बात पर जोर देते हैं कि सकारात्मक मानसिकता आत्म-जागरूकता और आत्म-स्वीकृति में निहित है। नकारात्मक पैटर्न को पहचानने और जीवन के प्रति अधिक आशावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहारों को समझना महत्वपूर्ण है। 2. वास्तविकता पर विचारों का प्रभाव: लेखक इस अवधारणा पर चर्चा करता है कि विचार वास्तविकता को आकार देते हैं। सचेत रूप से सकारात्मक विचारों को चुनकर और नकारात्मक विचारों को फिर से तैयार करके, व्यक्ति अपनी धारणाओं और अनुभवों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे अधिक अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं। 3. अभ्यास के रूप में कृतज्ञता:...