कैसे मनुष्य का मन, उसका मस्तिष्क एक रुग्ण घाव की तरह निर्मित हो गया है?
मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्य का मन, उसका मस्तिष्क एक रुग्ण घाव की तरह निर्मित हो गया है। वह एक स्वस्थ केंद्र नहीं है, एक अस्वस्थ फोड़े की भांति हो गया है। और इसीलिए हमारा सारा ध्यान मस्तिष्क के आस-पास ही घूमता रहता है। शायद आपको यह खयाल न आया हो कि शरीर का जो अंग रुग्ण हो जाता है, उसी अंग के आस-पास हमारा ध्यान घूमने लगता है। अगर पैर में दर्द हो तो ही पैर का पता चलना शुरू होता है और पैर में दर्द न हो तो पैर का कोई भी पता नहीं चलता। हाथ में फोड़ा हो तो उस फोड़े का पता चलता है। फोड़ा न हो तो हाथ का कोई पता नहीं चलता है। हमारा मस्तिष्क जरूर किसी न किसी रूप में रुग्ण हो गया है, क्योंकि चौबीस घंटे हमें मस्तिष्क का ही पता चलता है और किसी चीज का कोई पता नहीं चलता।
शरीर जितना स्वस्थ होगा, उतना ही उसका बोध नहीं होगा। जो अंग अस्वस्थ होता है, उसी का बोध होता है। मस्तिष्क का ही हमें बोध होता है शरीर में, उसके आस-पास ही हमारी चेतना घूमती है और जानती है और पहचानती है। जरूर वहां कोई रुग्ण घाव पैदा हो गया है। इस रुग्ण घाव से मुक्त हुए बिना, मस्तिष्क की इस अत्यंत अशांत और तनाव से भरी हुई स्थिति से मुक्त हुए बिना कोई व्यक्ति जीवन के केंद्र की ओर गति नहीं कर सकता है। इसलिए आज मस्तिष्क की इस स्थिति और इसमें परिवर्तन के लिए कुछ विचार हम करेंगे।
पहली तो बात है, हम मस्तिष्क की स्थिति को ठीक से समझ लें। यदि दस मिनट को आप एकांत में बैठ जाएं और आपके मन में जो विचार चलते हों उन्हें एक कागज पर ईमानदारी से लिख लें, तो उस कागज को आप अपने निकटतम मित्र को भी बताने को राजी नहीं होंगे। क्योंकि आप पाएंगे, उसमें ऐसे पागल विचार हैं जिनकी आपसे कोई भी अपेक्षा नहीं करता। आप स्वयं भी अपने से अपेक्षा नहीं करते। इतने असंगत, इतने व्यर्थ, इतने एक-दूसरे से असंबद्ध विचार हैं कि आपको प्रतीत होगा, आप पागल तो नहीं हो गए !
ईमानदारी से दस मिनट आप के मन में जो भी चलता है उसे वैसा ही लिख लें तो आप खुद ही आश्चर्य से भर जाएंगे कि मेरे मन के भीतर यह क्या चलता है! मैं स्वस्थ हूं या विक्षिप्त हूं? लेकिन कभी हम दस मिनट के लिए भी मन के भीतर झांक कर नहीं देखते कि वहां क्या चल रहा है। हो सकता है हम इसीलिए न झांकते हों कि हमें बहुत गहरे में इस बात का पता है कि वहां क्या चल रहा है।
शायद हम भयभीत हैं। इसीलिए आदमी अकेले में होने से डरता है और चौबीस घंटे किसी न किसी का साथ खोजता रहता है--कोई मित्र मिल जाए, कोई क्लब हो, कहीं भीड़ हो । नहीं कोई मिले तो अखबार मिल जाए, रेडियो मिल जाए, लेकिन अकेला कोई भी नहीं होना चाहता, क्योंकि अकेले होते से ही स्वयं की जो वास्तविक दशा है, उसकी खबरें मिलनी शुरू हो जाती हैं।
दूसरे की मौजूदगी में हम दूसरे में उलझे रहते हैं और खुद का कोई भी पता नहीं चलता। दूसरे की जो तलाश है, वह अपने दूर भागने की तलाश के सिवाय और कुछ भी नहीं है। वह स्वयं से पलायन है, स्वयं से एस्केप है।
हम जो दूसरे लोगों में इतने उत्सुक होते हैं उसका बुनियादी कारण यह है कि हम अपने से डरते हैं। और हमें भलीभांति पता है कि अगर हमने पूरी तरह अपने को जान लिया तो हम पाएंगे कि हम बिलकुल पागल हैं। इस स्थिति से बचने के लिए आदमी साथ खोजता है, संगी खोजता है, मित्र खोजता है, समाज खोजता है, भीड़ खोजता है।
एकांत से आदमी डरता है, एकांत से भयभीत होता है,
क्योंकि एकांत में उसकी वास्तविक स्थिति का प्रतिफलन मिल सकता है। उसके खुद के चेहरे की छाया उसे दिखाई पड़ सकती है। और वह बहुत घबड़ाने वाली होगी, वह बहुत रा वाली होगी। इसलिए सुबह उठने के बाद सोने तक हम अपने से भागने के सब उपाय करते रहते हैं कि कहीं स्वयं से मिलना न हो जाए, कहीं ऐसा न हो कि खुद से मुलाकात हो जाए।
और हजारों तरकीबें आदमी ने विकसित की हैं स्वयं से भागने की। और जितनी मनुष्य की मस्तिष्क की स्थिति बिगड़ती गई है उतने ही हमने स्वयं से भागने के लिए नये-नये आविष्कार किए हैं। अगर हम पिछले पचास वर्षों की मानसिक दशा का आंकलन करें तो हम पाएंगे कि पचास वर्षों में आदमी ने स्वयं से भागने की जितनी ईजादें की हैं, इसके पहले कभी भी नहीं की थीं। हमारे सिनेमा - गृह, हमारे रेडियो, हमारे टेलीविजन, सब स्वयं से भागने के उपाय हैं। और आदमी इतना परेशान होता जा रहा है।
मनोरंजन की इतनी खोज, स्वयं को थोड़ी देर के लिए भुलाने के लिए इतना आयोजन इसीलिए किया जा रहा है कि भीतर स्थिति बिगड़ती जा रही है। दुनिया भर में सभ्यता के बढ़ने के साथ-साथ नशों का प्रयोग बढ़ता चला गया है। और अभी नये-नये नशे खोजे गए हैं जिनकी यूरोप और अमरीका में जोर से धूम है।
लिसर्जिक एसिड है, मेस्कलीन है, मारिजुआना है। सारे यूरोप और अमरीका के सारे सभ्य नगरों में, सारे शिक्षित लोगों में जोर से नये-नये नशों की खोज चल रही है कि आदमी के लिए स्वयं को भूल जाने का कोई सुव्यवस्थित उपाय होना चाहिए, नहीं तो बहुत मुश्किल हो जाएगी।
क्या कारण इस सबके पीछे होगा? क्यों हम अपने को भूलना चाहते हैं? सेल्फ-फॉरगेटफुलनेस के लिए, आत्म- विस्मरण के लिए हम इतने आतुर क्यों हैं? और आप ऐसा न सोचें कि सिनेमा में जाने वाले लोग ही स्वयं को भूलते हैं। मंदिर में जाने वाले भी इसीलिए मंदिर जाते हैं, कोई फर्क नहीं है। मंदिर स्वयं को भूल जाने का पुराना उपाय है, सिनेमा नया उपाय है। एक आदमी बैठ कर राम-राम जपता रहता है, तो आप यह न सोचें कि वह कोई भिन्न काम कर रहा है। वह राम- राम के शब्द में स्वयं को भूलने की उसी भांति कोशिश कर रहा है जैसे कोई आदमी फिल्मी गीत सुन कर कर रहा हो। इन दोनों बातों में फर्क नहीं है ।
अपने से बाहर किसी भी चीज में उलझने की कोशिश-- वह चाहे राम हो, चाहे सिनेमा हो, चाहे संगीत हो--अपने से बाहर किसी भी चीज में उलझे रहने की कोशिश बहुत बुनियाद में, गहरे में अपने से बचने की कोशिश के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यह आत्म- पलायन चल रहा है और हम सब इसमें किसी न किसी रूप में संलग्न हैं। यह इस बात की सूचना है कि भीतर स्थिति बहुत बिगड़ती जा रही है और वहां झांकने का साहस भी हम खोते जा रहे हैं। वहां देखने का साहस भी ह खोते जा रहे हैं। वहां आंख ले जाने के लिए भी हम भयभीत हो गए हैं।
OSHO
संकलन: डी जी शास्त्री
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