कैसे मैं भगवान के दर्शन करु?
*कल्पित भगवान*
कल्पना भीतर बैठी है, नशे की हालत में और जल्दी साकार हो जाती है। इसलिए दुनिया भर में साधु नशा करते रहे, यह आकस्मिक नहीं है, यह एक्सिडेंटल नहीं है। कल्पना को बल देने में नशा बड़ा सहयोगी है। जो लोग नशा नहीं करते रहे, वे लोग उपवास करते रहे हैं। और यह बात जान लेना जरूरी है। दो ही तरह के वर्ग हैं दुनिया में साधुओं के, या तो नशा करने वाला या उपवास करने वाला। और आप हैरान होंगे, जो काम नशे से होता है वही उपवास से भी हो जाता है।
नशे से कुछ मादक द्रव्य शरीर में पहुंच जाते हैं, जो चित्त के होश को कम कर देते हैं। होश कम हो जाता है तो कल्पना जल्दी से साकार होने लगती है। बेहोशी में कल्पना साफ दिखाई पड़ने लगती है। बेहोशी में विचार बिलकुल नहीं रह जाता, इसलिए यह खयाल भी नहीं उठता कि जो मैं देख रहा हूं वह सच है या झूठ, यह विचार भी पैदा नहीं होता, जो दिखता है सच मालूम होता है।
सपने में रोज आप देखते हैं, सपना कभी आपको सपने के भीतर झूठ मालूम पड़ता है? कभी आपको ऐसा लगा कि यह मैं सपना देख रहा हूं, यह झूठ है? जागने पर लगता होगा, लेकिन सपने के भीतर सभी सपने सच मालूम पड़ते हैं। क्योंकि विचार नहीं होता निद्रा में, इसलिए जो दिखाई पड़ता है सच मालूम पड़ता है। विचार पूछता है कि जो है वह सच है या झूठ? और विचार न हो तो पूछने वाली कोई चीज आपके भीतर न रहेगी, फिर जो है वह सच है।
नींद में आपका विचार सोया हुआ है। तो जो भी सपना दिखाई पड़ता है वह मालूम होता है सच है। जागने पर जब विचार जग आता है तब यह शक पैदा होता है कि अरे यह सपना झूठ था, लेकिन सपने में कभी सपना झूठ नहीं होता। ऐसे ही नशे के भीतर कभी नशे में दिखाई पड़ने वाली चीजें झूठ नहीं होतीं। नशे के द्वारा कल्पना तीव्र हो जाती है विचार मंदा हो जाता है। तो जो सपने की स्थिति होती है वह वास्तविक जागते हुए हो जाती है। उपवास से भी यही हो जाता है। उपवास से शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है। आपको गहरा बुखार आया हो और बहुत दिन खाना न मिला हो, तो आपको पता होगा, कैसी-कैसी कल्पनाएं दिखाई पड़ने लगती हैं। खाट आसमान में उड़ती हुई मालूम पड़ सकती है। देवतागण हवा में घूमते हुए दिखाई पड़ सकते हैं। भूत-प्रेत छायाओं में दिखाई पड़ सकते हैं।
शरीर हो जाता है कमजोर, चित्त हो जाता है कमजोर, कमजोर चित्त फिर विचार करने में असमर्थ हो जाता है कि जो है वह सच है या झूठ, फिर कल्पना साकार हो जाती है।
तो अगर तीस वर्ष तक, बीस वर्ष तक कोई किसी भगवान के रूप को बना कर जपता रहे, जपता रहे, जपता रहे; आंख बंद करके भगवान को देखता रहे, देखता रहे, देखता रहे; नशा करे, उपवास करे, रोए-धोए, छाती पीटे, नाचे-गाए, तो दस-बीस वर्षों में अगर ये भगवान दिखाई पड़ने लगें तो यह मत समझ लेना कि ये भगवान हैं इसलिए दिखाई पड़ते हैं। यह आदमी बड़ा मेहनती है इसने भगवान पैदा कर लिए। यह इसका श्रम है, यह इसकी कल्पना को दिया गया बल है। सारे चित्त को लगाई गई चेष्टा है, इसमें कहीं कोई भगवान नहीं है।
और इसलिए यह भी हो सकता है कि अगर तुलसीदास को, मीरा को और अगस्तीन को तीनों को इस कमरे में रात बंद कर दिया जाए, तो अगस्तीन को न राम दिखाई पड़ेंगे न कृष्ण, दिखाई पड़ेंगे क्राइस्ट। मीरा को न क्राइस्ट दिखाई पड़ेंगे न राम, दिखाई पड़ेंगे कृष्ण। तुलसीदास को न दिखाई पड़ेंगे क्राइस्ट, न दिखाई पड़ेंगे कृष्ण, दिखाई पड़ेंगे राम। उसी एक कमरे में तीनों को तीन भगवान दिखाई पड़ेंगे और बाकी के दो भगवान दिखाई नहीं पड़ेंगे और सुबह वे विवाद करेंगे आपस में कि तुम्हारे भगवान तो थे ही नहीं, मेरे ही भगवान थे।
जो जिसने निर्मित कर लिया है वही दिखाई पड़ सकता है। आज तक धर्म के नाम पर बहुत तरह की कल्पनाएं प्रचलित रही हैं। और उन कल्पनाओं को अनुभव करने वाले लोग निश्चित इस खयाल में पड़ जाते हैं कि जो अनुभव हुआ वह सत्य का अनुभव है। और उनको कोई कसूर भी नहीं देता। जहां तक उनका संबंध है वे जो जानते हैं उनको बिलकुल ठीक मालूम पड़ता है, उसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। कसूर है तो एक कि वे उस विचार की फैक्लिटी को सुला देते हैं, जो निर्णय कर सकती थी कि जो है वह सच है या झूठ।
विश्वास इसीलिए इतने जोर से थोपा जाता है ताकि आपके भीतर का विचार सो जाए। अगर भीतर विचार है तो फिर इस तरह की कल्पनाओं को अनुभव करना संभव नहीं है। इसलिए विचार की हत्या की कोशिश की जाती है। जब विचार मर जाता है, सपने देखना आसान हो जाता है। और उन सपनों में आनंद भी मिलेगा, आनंद भी आएगा। क्योंकि वे सपने खुद के द्वारा निर्मित हैं इसलिए दुखद नहीं हो सकते, सुखद ही होंगे। और भगवान का दर्शन हो गया है, यह बड़े आनंद की बात है। इससे अहंकार की इतनी बड़ी तृप्ति होती है जितनी किसी और चीज से नहीं होती।
मुझे भगवान का दर्शन हो गया, मैंने भगवान को पा लिया, मैं भगवान को जानने वाला हूं और कोई भी नहीं। इसलिए इन भगवान को जानने वाले लोगों से अगर पूछें कि वह दूसरा आदमी भी कहता है कि मैं भगवान को जानने वाला हूं, वे हंसेंगे, वे कहेंगे, गलती कहता है। जानने वाला तो मैं ही हूं और कोई नहीं जानने वाला है। इसलिए तो दुनिया भर के साधु-संत लड़ते हैं आपस में कि मैं जानने वाला हूं, दूसरा जानने वाला नहीं है।
अगर दुनिया कभी अच्छी हुई तो इस तरह के मस्तिष्क का इलाज होना चाहिए। यह मस्तिष्क विकृत है। यह मस्तिष्क स्वस्थ नहीं है।
तो न तो श्रद्धा और न भक्ति कहीं ले जाती है। ले जाता है सिर्फ ज्ञान। कोई और मार्ग नहीं है, और सारे मार्ग सिर्फ दिखाई पड़ने वाले मार्ग हैं। ज्ञान के अतिरिक्त, जागरण के अतिरिक्त, स्वयं की चेतना के पूरी तरह विकसित होने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। बाकी मार्ग सिर्फ दिखाई पड़ते हैं। सिर्फ दिखाई पड़ते हैं, है नहीं। और वे दिखाई पड़ने वाले मार्ग आसान हैं, क्योंकि उन पर चलना नहीं होता केवल सपना देखना होता है, केवल कल्पना करनी होती है।
ज्ञान का मार्ग कठिन दिखाई पड़ता है, क्योंकि उस पर चलना होता है, जीवन को बदलना होता है, अग्नि से गुजरना होता है, प्राण को काट-काट कर विकसित करता होता है भीतर किसी चेतना को। न तो नींद काम दे सकती है, न नशा, न कोई सपने काम दे सकते हैं। इसलिए श्रद्धा के छूटने से अगर भक्ति छूटती हो तो बहुत अच्छा, वे दोनों जुड़े हैं। वह एक ही चीज का विकास है। विश्वास और श्रद्धा जाएगा तो भक्ति के खड़े होने के लिए कोई जगह नहीं है। नींद चली जाए तो सपने के खड़े होने को कोई जगह नहीं रह जाती। श्रद्धा की नींद में भक्ति के सपने आते हैं। श्रद्धा की नींद न हो तो भक्ति के सपनों की कोई जगह नहीं है। और उस भांति का जो जागरण है और उस जागरण में जो जाना और देखा गया है, वही सत्य है।
स्मरण रखें, जहां मैं पूरी तरह प्रबुद्ध हूं, पूरी तरह विचार और विवेक से युक्त, और जहां मेरे मन पर कोई तंद्रा, कोई मादकता, कोई नशा, कोई कल्पना नहीं, उस परिपूर्ण जागरण में ही मैं जो जानूंगा वही सत्य हो सकता है और कुछ सत्य नहीं हो सकता। ऐसी परिपूर्ण जागरण की जो अवस्था है वही ज्ञान है।
ओशो; अंतर की ख़ोज
संकलन: डी जी शास्त्री
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