मनन शब्द को समझें।
मनन शब्द को समझें। विचार और मनन दोनों ही मन की क्रियाएं हैं, पर दोनों बड़ी भिन्न हैं। भिन्न ही नहीं, वरन विपरीत भी।
एक तैरने वाले को देखें–एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है, लेकिन रहता नदी की सतह पर है। अ से ब, ब से स स्थान बदलता है, गहराई नहीं बदलती। फिर पानी में डुबकी लगाने वाले को देखें–वह भी स्थान बदलता है, लेकिन गहराई बदलती है; अ से अ एक, अ दो, अ तीन–एक ही स्थान पर गहरा उतरता है डुबकी लगाने वाला। तैरने वाला एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है, गहराई में नहीं जाता है।
विचार तैरने जैसा है, मनन डुबकी जैसा है। विचार में एक शब्द से दूसरे शब्द पर हम जाते हैं; मनन में एक ही शब्द की गहराई में जाते हैं। स्थान नहीं बदलता, गहराई बदलती है।
विचार रेखाबद्ध प्रक्रिया है, सतह वही बनी रहती है। तुम चाहे दुकान की बात सोचो, चाहे मोक्ष की; सतह में कोई फर्क नहीं पड़ता, रहते तुम पानी की सतह पर ही हो। तुम चाहे परमात्मा के संबंध में सोचो और चाहे पत्नी के, सोच की सतह वही बनी रहती है।
मनन से सतह की जगह गहराई में यात्रा शुरू होती है। मनन में एक ही शब्द को उसकी समस्तता में, उसके गहरे तलों तक प्रवेश करने की चेष्टा करनी होती है।
मनन ही मंत्र है। इसे ठीक से समझ लें तो यह पूरा सूत्र साफ हो जाएगा। और नानक की सारी शिक्षाओं का सार मनन है। इसलिए तो एक नाम ओंकार–बस उस एक ओंकार के नाम को, एक सतनाम को अपने शिष्यों को वे देते रहे।
उस पर सोचना नहीं है, उसमें डूबना है। उस पर विचार नहीं करना है, उसकी गहराई में डुबकी लगानी है। एक ही नाम गूंजता रहेगा–ॐ, ॐ, ॐ, ॐ…और जैसे-जैसे नाम की गूंज बढ़ेगी, वैसे-वैसे तुम्हारी गहराई का तल बदलेगा।
तीन तल हैं। पहले सोच्चार, तुम जोर से उच्चार करते हो ओंकार का–ॐ…। ओंठ का प्रयोग होता है, बाहर वाणी गूंजती है; इसको हम वाणी का तल कहें। फिर तुम ओंठ बंद कर लेते हो, जीभ भी नहीं हिलाते, मन में ही गूंज होती है–ॐ…। यह दूसरा तल है। यह पहले तल से गहरा है। इसमें शरीर का उपयोग नहीं हो रहा। ओंठ, जीभ सब बंद हैं, सिर्फ मन का उपयोग हो रहा है। तुम एक सीढ़ी नीचे उतर गए। फिर तीसरी सीढ़ी है, जहां मन का भी उपयोग नहीं हो रहा है; जहां तुम ओंकार की ध्वनि नहीं करते, तुम सिर्फ चुप हो कर सुनते हो और ध्वनि गूंजती है। तब मन भी गया। जैसे ही मन गया, मनन हुआ। मनन यानी मन का न हो जाना। जहां मन न हुआ, वहां मनन शुरू हुआ।
सबसे पहले, तुम्हारे भीतर ओंकार की ध्वनि गूंजती है जन्म के साथ। तुम्हें बच्चे प्रसन्न दिखाई पड़ते हैं–अकारण; अपने झूले में पड़े टांगें फेंक रहे हैं, हाथ हिला रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं। माताएं समझती हैं कि शायद पिछले जन्म की कोई स्मृति आ रही है तो आनंदित हो रहे हैं। क्योंकि कोई कारण तो नहीं है आनंदित होने का–न कोई चुनाव जीता है, न कोई धन कमा लिया है, न कोई प्रतिष्ठा पा ली है; अपने झूले में पड़े, अभी यात्रा शुरू ही नहीं हुई; अभी प्रसन्नता क्या है? मनस्विद भी बड़ी चिंता करते रहे हैं कि बच्चे की प्रसन्नता का कारण क्या है? जहां तक मनस्विदों की समझ जाती है, वे मानते हैं कि शारीरिक स्वास्थ्य है। क्योंकि बच्चा प्रसन्न है, क्योंकि शरीर से स्वस्थ है।
लेकिन जहां तक योगियों की खोज ले जाती है, वहां कारण दूसरा है। शरीर का स्वास्थ्य काफी नहीं है। भीतर ओंकार का नाद गूंज रहा है, एक मधुर संगीत भीतर गूंज रहा है; जो बच्चा सुनता है, उसकी तारी लग जाती है। सुनता है, मुस्कुराता है, आनंदित होता है। स्वास्थ्य तो बाद में भी रहेगा, लेकिन यह प्रसन्नता खो जाएगी। पीछे भी स्वस्थ रहेगा, लेकिन यह नाद खो जाएगा। ओंकार की ध्वनि को सुनना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि शब्दों की पर्त उसे घेर लेगी।
ध्वनि–एक ओंकार सतनाम–वह पहली घटना है। वहां जीवन का स्रोत है। फिर शब्दों का जमाव है। वह हमारी शिक्षा, संस्कार, समाज, सभ्यता! फिर तीसरी पर्त है, शब्दों का उच्चारण–बोलना, बातचीत, वार्तालाप। जब तुम बोल रहे हो, तब तुम अपने से सबसे ज्यादा दूर हो। इसलिए तो नानक कहते हैं कि पहले सुनना सीख लो; क्योंकि जब तुम सुन रहे हो, तब तुम मध्य में हो। तब तुम बोलने की तरफ भी जा सकते हो और चाहो तो शून्य की तरफ भी जा सकते हो। तुम बीच में खड़े हो।
तीन स्थितियां हुईं–ओंकार की स्थिति, उच्चार की स्थिति और दोनों के मध्य में भाव और विचार की स्थिति। जब तुम सुन रहे हो–श्रवण–तब तुम भाव और विचार की स्थिति के बीच में खड़े हो। अभी तुम दोनों तरफ झुक सकते हो, दाएं या बाएं। जो तुमने सुना, अगर तुम दूसरे को बताने निकल पड़े, तो तुम वार्ता में उतर गए। जो तुमने सुना, अगर तुम उसको गुनने लगे, मनन करने लगे, तो तुम शून्य में चले गए। और बारीक है फासला। और हर व्यक्ति को अपने भीतर फासले को ठीक से समझ कर संतुलन को व्यवस्था देनी पड़ती है।
मनन उसी क्षण शुरू हो जाता है, जब तुम किसी एक शब्द की गहराई में उतरने लगते हो। और कोई भी शब्द काम दे सकता है। लेकिन ओंकार से सुंदर कोई शब्द नहीं, क्योंकि वह शुद्ध ध्वनि है। अल्लाह भी काम देता है, राम भी काम देता है, कृष्ण भी काम देता है। और कोई ये बड़े-बड़े नाम लेने की जरूरत नहीं है। अंग्रेजी के महाकवि टेनिसन ने लिखा है कि मैं अपना ही नाम दुहरा लेता हूं और तारी लग जाती है; टेनिसन…टेनिसन…टेनिसन…उससे भी लग जाएगी।
कोई भी एक शब्द की गहराई में तुम उतरोगे तो धीरे-धीरे शब्द छूट जाएगा। और धीरे-धीरे जैसे-जैसे शब्द छूटेगा, वैसे-वैसे मनन शुरू हो जाएगा। शब्द तो छूट जाता है। सभी मंत्र छूट जाते हैं। तभी तो महामंत्र का उदघोष होता है जब मंत्र छूट जाते हैं। क्योंकि मंत्र तो तुम्हारे ही मन की, तुम्हारी ही पकड़ है। महामंत्र तो गूंज ही रहा है। तो मंत्र महामंत्र में नहीं ले जाता, मंत्र तो तुम्हें केवल चुप करवाता है। महामंत्र सुनाई पड़ने लगता है।
ओशो; एक ओंकार सतनाम
संकलन: डी जी शास्त्री
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