क्या है,सम्यक आहार, सम्यक व्यायाम, सम्यक निद्रा ?
प्रश्न. ओशो, यहां तो खाने की इच्छा ज्यादा होती है।
हां खाने की इच्छा ही भोजन को असम्बक कर देती है। भोजन कितना जरूरी है, यह एक तरफ रह जाता है और खाने का रस ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। हममें से बहुत ही कम —लोग शरीर को भोजन देते हैं, हममें से अधिक लोग स्वाद को भोजन देते हैं।
स्वाद शरीर की आवश्यकता नहीं है। स्वाद हमारे मन की वासना है। और स्वाद के कारण हम ज्यादा खा लेते हैं। थोड़ा होशपूर्वक करेंगे तो ऐसा नहीं होगा। थोड़ा होशपूर्वक करेंगे और इतना स्मरण रखेंगे कि शरीर के लिए भी हितकर हो, मन के लिए भी हितकर हो, तो बहुत कठिन बात नहीं है। यानी इतनी कठिन बात नहीं है जितना हम सोचते हैं।
फिर अगर ज्यादा खाने की इच्छा होती हो तो ज्यादा अच्छा है कि बहुत चबा कर खाएं। तो आप ज्यादा देर तक खाएंगे। आखिर ज्यादा देर तक एक आदमी आधा घंटे तक खाना खाने में क्या रस पाता होगा? आधा घंटे तक उसको स्वाद का अनुभव होता है। तो जितना भोजन आप पंद्रह मिनट में कर लेते हैं, उतने भोजन को आधा घंटे में चबा कर करें। तो आपको रस आधा घंटे भोजन करने का मिलेगा और लाभ बहुत ज्यादा हो जाएंगे। लाभ बहुत ज्यादा ये हो जाएंगे, वह चबा हुआ भोजन सुपाच्य होगा, वह पेट को भारी नहीं करेगा, कम मात्रा में आपके शरीर को ज्यादा पोषण मिलेगा, शरीर ज्यादा स्वस्थ होगा। और जो भोजन शरीर को ज्यादा स्वस्थ करता हो, वह भोजन चित्त को शांत करने में सहयोगी हो जाता है। अगर शरीर परिपूर्ण निरोग स्थिति में हो, तो चित्त का शांत हो जाना बहुत आसान है कठिन नहीं है। चित्त की अशांति का बहुत कारण शारीरिक होता है।
तो वह जो ताराचंद्र भाई ने पूछा यह संभव है कि कल उनको ठीक से न हुआ हो। उसके दो कारण हो सकते हैं। एक तो उन्होंने भोजन ज्यादा किया, कल सांझ को वे टहले भी ज्यादा। उसकी थकान भी नुकसान पहुंचाएगी।
सम्यक आहार हो, सम्यक व्यायाम भी हो। सम्यक व्यायाम का अर्थ है कि आप इतना श्रम करें कि श्रम आपको थकान का बोध न दे। जिस सीमा पर श्रम थकान का बोध देने लगे, समझना चाहिए शरीर उस सीमा तक श्रम करने को राजी नहीं है। सम्यक व्यायाम न हो तो भी ध्यान में असुविधा और बाधा होगी। अगर बिलकुल व्यायाम न हो तो भी बाधा होगी, अगर अतिशय हो जाए तो भी बाधा होगी। सम्यक का अर्थ है बिलकुल संतुलित, बिलकुल बीच में, बिलकुल माध्यमिक।
जो बिलकुल श्रम नहीं करता, उसके शरीर में, उसके चित्त में एक तरह का आलस्य छाया रहेगा। वह आलस्य बाधा होगा। जिसने बहुत ज्यादा श्रम कर लिया है, उसके चित्त और शरीर में एक तरह की थकान होगी, वह थकान बाधा होगी। अगर आप दिन भर कोई श्रम नहीं किए हैं तो भी आपको रात में नींद नहीं आएगी और अगर आप अति श्रम कर लिए हैं तो भी नींद नहीं आएगी। दोनों स्थितियों में विश्राम को बाधा पहुंच जाएगी। और उसी भांति दोनों स्थितियों में ध्यान को भी बाधा पहुंच जाएगी।
तो सम्यक आहार हो, सम्यक व्यायाम हो और सम्यक निद्रा हो।
सम्यक निद्रा का अर्थ हर एक के लिए अलग होगा—जैसे सम्यक आहार का अलग होगा, सम्यक व्यायाम का भी अलग होगा।
हमारे मुल्क में निद्रा के प्रति कुछ बुरी धारणा है। कम से कम साधकों के मन में निद्रा के प्रति बुरी धारणा है। उनका खयाल है, निद्रा जो है वह पाप ही है। जितनी कम ली जाए उतना अच्छा।
यह बात गलत है। न तो निद्रा का ज्यादा लेना अच्छा है। अगर ज्यादा निद्रा हो जाएगी
तो उसका परिणाम होगा कि दिन भर आपमें एक ताजगी का अभाव रहेगा, शरीर बहुत शिथिल मालूम होगा, मस्तिष्क भारी मालूम होगा। और अगर निद्रा कम हुई तो वह कम निद्रा पूरा होने की दिन भर कोशिश करेगी। और उसकी वजह से आप दिन भर उनींदे अनुभव करेंगे।
अभी कुछ लोगों ने मुझे कहा कि ध्यान में उन्हें नींद आ गई। ध्यान में नींद तभी आ सकती है जब आपकी निद्रा कम हो रही हो, नहीं तो नींद नहीं आ सकती। अगर आपने रात्रि निद्रा कम ली है, तो जब आप ध्यान करने बैठेंगे—शरीर शिथिल होगा, चित्त शांत होगा—पहला ही काम होगा कि नींद आ जाएगी। क्योंकि नींद के लिए भी ये दो बातें जरूरी हैं कि शरीर शिथिल हो और चित्त थोड़ा शांत हो। अगर चित्त बहुत अशांत है, चिंतित है, चिंताओं से भरा है, तो नींद विलीन हो जाती है। अगर शरीर में बहुत टेंशन, बहुत तनाव हैं, तो नींद विलीन हो जाती है। तो नींद के लिए वे दो गुण, लक्षण अनिवार्य हैं—जब कि चित्त शांत हो और शरीर शिथिल हो। ध्यान के लिए भी वे जरूरी है कि चित्त शांत हो और शरीर शिथिल हो। ये दोनों प्रारंभिक सीढ़ियां दोनों के लिए जरूरी हैं। तो जिसकी नींद कम है वह इन दो सीढ़ियों के बाद तक्षण निद्रा की दिशा में चला जाएगा। लेकिन जिसकी निद्रा पूर्ण हो गई है, वह निद्रा में तो नहीं जाएगा, वह फिर ध्यान में जा सकेगा। ध्यान और निद्रा की
प्राथमिक अवस्थाएं वे ही हैं, एक सी हैं। अंतिम अवस्था में भेद है। शरीर शिथिल होगा, चित्त शांत होगा, निद्रा में मूर्च्छा आ जाएगी। शरीर शिथिल होगा, चित्त शांत होगा, ध्यान में जागृति आ जाएगी। वह जागृति और मूर्च्छा का भेद है पीछे। लेकिन प्राथमिक दो चरण दोनों में समान हैं।
इसलिए निद्रा भी सम्यक हो। और यह हर एक को अपने लिए तय कर लेना चाहिए थोड़े दिन प्रयोग करके कि कितनी नींद उसे जरूरी है। बच्चे अठारह—बीस घंटे सोएंगे, फिर कम होती जाएगी, फिर दस—बारह घंटे रह जाएगी फिर आठ घंटे रह जाएगी, फिर वृद्ध होते—होते वह चार—पांच घंटे रह जाएगी। और इसलिए यह धारणा भी आपकी गलत है कि कम सोना अच्छा है; क्योंकि अगर आप युवावस्था में कम सोने लगते हैं तो वृद्धावस्था जल्दी आ जाएगी, वह वृद्धावस्था का लक्षण है। इसलिए कभी भूल कर यह प्रयोग न करें कि आप कम सोने की चेष्टा करें। जैसा धार्मिक लोग, जो धर्म में उत्सुक हो जाते हैं वे करना शुरू कर देते हैं। और इसमें भी गौरव अनुभव करते हैं कि हम तीन घंटे सोते हैं कि चार घंटे, कि हम सिर्फ पांच ही घंटे सोते हैं कि हम कोई बड़ी भारी बात साध रहे हैं। वे सिर्फ नासमझी कर रहे हैं।
शरीर को निद्रा की जरूरत तब कम रहती है, जब उसमें नये सेल्स, नये कोष्ठ बनना बंद
हो जाते हैं। बच्चा अठारह घंटे सोता है, बीस घंटे सोता है। मां के पेट में वह चौबीस घंटे सोता है। उस वक्त उसके शरीर में निर्माण हो रहा है। सारी शक्तियां निर्माण कर रही हैं। इसलिए जागने की फुर्सत नहीं है। फिर जैसे—जैसे शरीर की निर्माणकारी शक्तियां कम होने लगती हैं और शरीर की विध्वंस की शक्तियां तीव्र होने लगती हैं, यानी शरीर में ज्यादा सेल्स टूटते हैं और कम बनते हैं, वैसे—वैसे नींद कम होती चली जाती है। बुढापे में सेल्स टूटते ही हैं बनते नहीं हैं, इसलिए नींद खतम हो जाती है। तो नींद का कम हो जाना कोई अच्छा लक्षण नहीं है।
लेकिन एक और कारण से भी नींद कम हो सकती है। तो नींद आपको कम करना नहीं है, आपको तो पूरा लेना है जितना आपके लिए जरूरी मालूम हो। कम से कम सात घंटा—कम से कम प्रत्येक के लिए जरूरी। ज्यादा से ज्यादा आठ घंटे, कम से कम छह घंटे, इससे कम नहीं, इससे ज्यादा नहीं, सामान्यत:। अगर आप बहुत ठीक से सम्यकरूपेण चौबीस घंटे का जीवन जीए हैं, तो यह हो सकता है नींद आपकी छह घंटे में पूरी हो जाए। वह अपने आप छह घंटे में पूरी हो जाती हो और छह घंटे के बाद आपको कोई वजह न मालूम होती हो पड़े रहने की, तो उसका अर्थ यह है कि आप इतने शांत हैं और आप इतने व्यवस्थित हैं कि शरीर के बहुत से सेल्स नहीं टूट रहे हैं, और इसलिए नींद आपकी अल्प हो गई है।
अल्प निद्रा नहीं है जरूरी, अगर ध्यान के और शांत जीवन के प्रयोग से नींद थोड़ी कम हो जाए तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर आप कोशिश करके कर लें तो हर्ज है। और इस सदी में खासकर हमारी तीन—चार चीजों पर ही हमला हो गया है। मैंने कहा. सम्यक व्यायाम सम्यक आहार और सम्यक निद्रा। ये तीनों चीजें हमारी सभ्यता ने तोड़ दी हैं।
निद्रा पर तो बहुत आघात हुआ है। नींद तो जैसे हम तोड़े ही जा रहे हैं, जैसे हम सोचते हैं, नींद की कोई जरूरत नहीं। हमारे जितने वैज्ञानिक आविष्कार हैं वे सब नींद के विरोधी हैं। सिनेमा है, रेडियो है, और सारी बातें हैं। और हमारी जो सभ्यता और संस्कृति है, वह भी नींद की विरोधी है। जैसे शाम के बाद ही दुनिया शुरू होती है। दिन भर आप काम करते हैं और शाम के बाद दुनिया शुरू होती है। रात .को देर तक आप काम में लगे रहेंगे, देर तक व्यस्त रहेंगे और ऐसी चीजों में व्यस्त रहेंगे जिनका आंख पर इतना जोर पड़ता है— या तो पढ़ेंगे या सिनेमा देखेंगे—ये इतने जोर डालने वाली बातें हैं आंख पर कि इनके खिंचाव और तनाव जब आप सो जाएंगे, तब भी आपकी आंखों के भीतर के स्नायु खिंचे रहेंगे वे आपको नींद नहीं आने देंगे।
यह सदी सबसे ज्यादा अनिद्रा से ग्रसित है। और जो जितना मुल्क सभ्य है, आप इससे उसका अंदाज लगा सकते हें कि कौन कितना मुल्क सभ्य है। जिस मुल्क में जितने लोगों को कम नींद आती हो वह मुल्क उतना ज्यादा सभ्य है। अमरीका सबसे ज्यादा सभ्य मुल्क है, क्योंकि वहां अनिद्रा की बीमारी सबसे ज्यादा है। और वहां सैकड़ों लोगों को, जिनकी संख्या प्रतिदिन बढ़ती जाती है, बिना दवा लिए सोना असंभव हो गया है। एक वक्त आएगा जब हम सब लोग बिलकुल सभ्य हो जाएंगे, तो कोई भी बिना दवा के नहीं सो सकेगा।
सभ्यता जो हमारी है वह प्रकृति के बिलकुल प्रतिकूल होने से, हमारा सब जीवन अस्तव्यस्त हुआ चला जा रहा है। नींद पर बहुत चोट हुई है। हम उसका खयाल ही भूल गए। जैसे वह एक गैर—जरूरी चीज है, वक्त मिला तो उसे ले लिया, उसकी कोई खास जरूरत नहीं है। मेरा कहना है वह सबसे ज्यादा जरूरी चीज है और उसे सम्यक होना जरूरी है।
तो नींद आपकी सम्यक हो संतुलित हो; भोजन सम्यक हो, संतुलित हो; और व्यायाम भी संतुलित हो और सम्यक हो।
व्यायाम भी हमसे छिन गया है। इस समय दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक जो केवल व्यायाम करते हैं, वे इसलिए परेशान हैं कि उन पर व्यायाम का बोझ ज्यादा है श्रम ज्यादा है। दूसरे वे लोग हैं जो बिलकुल श्रम नहीं करते, वे इसलिए परेशान हैं कि उन पर श्रम का बोझ बिलकुल नहीं है। समाजवाद अगर दुनिया में कोई एक लाभ लाएगा तो मेरे लिहाज से वह यह होगा कि उससे श्रम बराबर वितरित हो जाएगा। और बाकी लाभ जो होंगे होंगे कम से कम श्रम बराबर वितरित हो जाना चाहिए। कुछ लोग हैं जो श्रम की वजह से दुखी और पीड़ित हैं, जिनका जीवन श्रम सोख लेता है। और कुछ लोग विश्राम से पीड़ित और दुखी हैं, जिनका जीवन विश्राम सोख लेता है। संतुलन दोनों तरफ टूट गया है। यह संतुलन भी आपको जीवन में सम्हाल लेना चाहिए। अगर ध्यान में बहुत तीव्र गति में जाना हो, तो यह सतुलन भी सम्हाल बड़ा काम का।
ये तीन बातें आपके लिए बड़ी सहयोगी होंगी। इसमें एक बात और आपको कह दूं— कि इन तीनों बातों का एक तो मोटा अर्थ है जो मैंने आपको बताया, कुछ सूक्ष्म अर्थ भी है।
जैसे सम्यक आहार है। आहार का अर्थ हम साधारणत: भोजन लेते हैं, लेकिन आहार का और सूक्ष्म अर्थ भी है—जो भी हम इंद्रियों से लेते हैं वह सब आहार है। आंख से लेते हैं रूप, वह भी आहार है। कान से ध्वनि सुनते हैं, वह भी आहार है, वह कान का आहार है। रूप आंख का आहार है। हाथ से कोई चीज स्पर्श करते हैं, वह हाथ का आहार है। आहार का मतलब है जो भी इंद्रियों के द्वारा मेरे भीतर आता है। भोजन तो आता ही है, वह तो आहार है ही, बाकी ये सब चीजें भी आहार हैं। ये भी अगर सम्यक हों, तो ध्यान में अदभुत गति हो जाएगी। अगर आप आंख से वही देखें जो देखने जैसा है और उसे न देखें जो कि देखने जैसा नहीं है, तो आप पाएंगे कि आपके ध्यान में बड़ी गति आ जाएगी। कान से आप वही सुनें जो सुनने जैसा है, जो सुनने जैसा नहीं हैं उसे न सुनें, तो आपके जीवन में बड़ी शांति आ जाएगी।
अभी हम क्या है हमें इसका कोई भेद ही नहीं कि क्या देखने जैसा है, क्या नहीं देखने जैसा है। हम सब देखे चले जाते हैं। हम यह भी फिक्र नहीं करते कि क्या सुनने जैसा है, क्या नहीं सुनने जैसा है। हम सब सुने जाते हैं। अगर मेरे घर में कोई कचरा फेंक दे तो मैं झगड़ा करूंगा और मेरे कान में कोई कचरा फेंक जाता है, मैं बिलकुल झगड़ा नहीं करता।
अब मैं सुबह से ही सुन रहा हूं चारों तरफ देखता हूं हर आदमी एक—दूसरे के कान में कुछ न कुछ डाल रहा है। यह बड़ी हैरानी की बात है! और आप बड़े मजे से बैठे उसको बर्दाश्त कर रहे हैं और सह रहे हैं कि आप डाले चले जाइए और आप बैठे हैं। तो यह कान का आहार हो गया। फिर आप सोचते हैं कि डाल देने से मुक्ति है? डाल देने से मुक्ति नहीं है, डालने के बाद अब आप उसको मथेंगे, वह आपके दिमाग में चलेगा, वह आपको परेशान करेगा। और हम इतने उत्सुक हैं एक—दूसरे के. कान में कुछ भी डालने को! जिसका हमारे लिए कोई मूल्य नहीं है, उसको हम दूसरे के कान में क्यों फिजूल डाल रहे हैं? अगर उसका कोई मूल्य होता तो हमारी जिंदगी में कुछ मूल्य आ जाता। पर हम सब लोग एक—दूसरे के कानों के दुश्मन हैं।
समाधि कमल--(प्रवचन--03)
संकलन: डी जी शास्त्री
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