साधारणत: हम भीड़ में क्यों जीते हैं ?


एक मक्खी भी तुम्हारे ऊपर बैठ गई है, उसे भी उड़ाना हो तो अत्यंत करुणापूर्वक उड़ाओ। उस अवसर को भी मत चूको, क्योंकि जितनी-जितनी ऊर्जा करुणा में परिणत हो जाए, उतनी-उतनी ऊर्जा क्रोध को मिलनी बंद हो जाएगी। ऊर्जा वही है; क्रोध को देते हो तो क्रोध पलता है, करुणा को देते हो तो करुणा पलती है। बुद्ध के जीवन-सूत्रों में उपेक्षा बड़ी महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं, जिस चीज से मुक्त होना हो, उस तरफ पीठ कर लो। दबाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ उपेक्षाभाव रखने की जरूरत है। अपने को वहा से शिथिल कर लो। है माना, लेकिन सारी ऊर्जा विपरीत छोर पर बहने लगे तो धीरे-धीरे तुम पाओगे, कि जो शक्ति क्रोध को मिलती थी, वह बची ही नहीं।

इसे तुम थोड़ा करके देखो। क्रोध से जूझो भी मत। अगर कामवासना से पीड़ित हो तो कामवासना से जूझो मत, अन्यथा वह बढ़ती चली जाती है। जितने तुम लड़ोगे, उतना ही तुम पाओगे, घाव गहरे होते चले जाते हैं। और बार-बार हारोगे तो धीरे-धीरे आत्मविश्वास भी खो जाएगा। और आत्मविश्वास खो जाए तो साधक बुरी तरह भटक जाता है। लड़ो भी मत।

'पंडित अशुभ को छोड़कर शुभ का ध्यान करे और बेघर होकर ऐसे एकांत में वास करे जहां कि जी लगना कठिन होता है।’

साधारणत: हम भीड़ में जीते हैं। साधारणत: हम भीड़ में ही बड़े हुए। साधारणत: हम भीड़ का ही अंग हैं। साधारणत: भीड़ हमारे भीतर भरी है। भीड़ ने हमारे भीतर भी कब्जा कर लिया है। हमारे भीतर कोई एकांत स्थान नहीं बचा है। तुम कहते जरूर हो कि अपने घर में तो प्राइवेसी है, एकांत है; वहां भी नहीं है। रात के सपने तक में भीड़ तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। तुम्हारी दयनीय अवस्था सोचो तो! रात सोए हो, सपने में पड़े हो, तब भी लोग मौजूद हैं। अनचाहे मेहमान मौजूद हैं, न बुलाए मेहमान मौजूद हैं। और ध्यान रखना, उनका कोई कुसूर नहीं है, वे आए भी नहीं हैं। इजिप्त में एक सम्राट हुआ, वह थोड़ा झक्की था। उसने राज्य में आज्ञा पिटवा दी कि अगर मेरे 'सपने में कोई आया तो मरवा डालूंगा।

अब बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई। लोग डरने लगे। करोगे भी क्या? दूसरों का कोई मामला नहीं। कोई तुम्हारे सपने में थोड़े ही आता है। तुम ही बुलाते हो। तुम्हारी ही धारणा है। कहते हैं, उसने एक वजीर को सूली पर लटकवा दिया, क्योंकि रात सपने में आ गया, नींद खराब की।

ध्यान रखना, कोई तुम्हारे सपने में आ नहीं रहा है। तुम भीड़ हो; अभी तुम व्यक्ति नहीं। अभी तुम्हारे भीतर आत्मा पैदा नहीं हुई। अभी तो तुम जोड़-तोड़ हो। हजार तरह का कूड़ा-करकट तुम्हारे भीतर भरा है। अभी तो तुम एक तरह के कबाड़खाने हो। किसी की टल, किसी का हाथ, किसी की नाक, किसी का कान, सब तुम्हारे भीतर इकट्ठे हैं। तुम तो एक ढेर हो। तुम्हारे भीतर अभी तुम नहीं हो और सब कुछ है। भीतर जाओगे तो सब मिलेगा—बाजार मिलेगा, दुकान मिलेगी, शास्त्र मिलेंगे, मंदिर-मस्जिद मिलेगी, तुम भर न मिलोगे। भीतर खोजोगे तो अपने भर को न पाओगे और सारा संसार पा लोगे। कैसा मजा है!

तो साधक को शुरुआत में अपने को भीड़ से बाहर करने की जरूरत है। और यह भीड़ से बाहर करना बाहर की ही बात नहीं है; तुम जंगल भी भाग सकते हो, इससे बहुत कुछ न होगा। जंगल में भी बैठ जाओगे तो सोचोगे तो बाजार की; थोड़ा ज्यादा ही सोचोगे।
      
अक्सर ऐसा होता है कि लोग जब ध्यान करने बैठते हैं, तब संसार की ज्यादा सोचते हैं। ऐसे भी नहीं सोचते साधारणत: उतना। मंदिर जाते हैं, तब दुकान का ज्यादा विचार करते हैं। फुरसत मिल जाती है। और कुछ काम भी नहीं रहता वहा।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि बड़ी आश्चर्य की बात है। इतने विचार तो हमें साधारणत: नहीं होते, लेकिन जब ध्यान करने बैठते हैं, तब बड़ा आक्रमण होता है। ध्यान विचार ही विचार से भर जाता है।
      
बाकी समय तुम उलझे रहते हो। विचार तो चलते रहते हैं, लेकिन देखने की भी फुरसत कहां? ध्यान के समय तुम खाली होकर बैठते हो, थोड़ी नजर मुक्त होती है, उलझाव नहीं होता। सारी दुनिया झपट पड़ती मालूम पड़ती है।

प्रश्न बाहर का नहीं है, लेकिन बाहर का एकांत भी सहयोगी हो सकता है। असली सवाल भीतर के स्वात का है। 'ऐसे एकांत में वास करे कि जहा जी लगना कठिन होता है।
 
तुम्हारा जी ही भीड़ में लगता है। खाली बैठे हो, अखबार पढ़ोगे। अखबार यानी भीड़ की खबरें। खाली बैठे हो, रेडियो खोल लोगे, टेलीविजन चला लोगे। खाली बैठे हो तो मित्र के घर पहुंच जाओगे, क्लब पहुंच जाओगे, पड़ोसी से ही बात करने लगोगे। खाली बैठे हो तो कुछ न कुछ करोगे। बिना दूसरे के तुम्हारा जी नहीं लगता। दूसरे पर इतने निर्भर हो? दूसरा तुम्हारा मालिक है? दूसरे के बिना घड़ीभर बिताना मुश्किल हो जाता है। तुम्हारी स्वतंत्रता कैसी है? यह तुम्हारा स्वामित्व कैसा है? तुम अपने भी नहीं हो।
      
वही व्यक्ति अपना स्वामित्व पाना शुरू करता है, जो एकांत और निज को जीने लगता है। जो अपने साथ होने में भी आनंद पाता है। दूसरे के साथ होना ही जिसका एकमात्र सुख नहीं है; जिसका अपने साथ होना परमसुख बन जाता है।

ओशो 
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संकलन: डी जी शास्त्री 

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