अहंकार से छुटकारा कैसे पाएं ?

अहंकार 

मैं तुम्हें तुम्हारे अहंकार से मुक्त नहीं करवा सकता कोई तुम्हें नहीं करवा सकता। तुम चाहो तो हो सकते हो। तुम न चाहो तो कोई उपाय नहीं है। तुम चाहो तो जरूर हो सकते हो। लेकिन चाह को बड़ी गहरी क्रांति से गुजरना होगा।

पहला नियम है अहंकार से मुक्त होने का कि तुम पहले मुक्त होने की चेष्टा न करो; इस चेष्टा के बजाय अपने अहंकार की सारी सूक्ष्म गतिविधियों को पहचानो कि कहां कहां से अहंकार मजबूत होता है; कैसे  कैसे मजबूत होता है; कैसे  कैसे तर्क खोजता है; कैसी कैसी तरकीबें निकालता है। उन सारी तरकीबों को अगर तुम जाग कर देखने लगो तो धीरे  धीरे तुम पाओगे : जैसे  जैसे तुम जागने लगे वैसे  वैसे अहंकार क्षीण होने लगा।

अहंकार कुछ है नहीं। तुम अपने को धोखा दे रहे हो। अब तुम ही अपने को धोखा देना चाहते हो तो बड़ी कठिनाई है। कोई सोया हो तो जगा दो; लेकिन कोई पड़ा हो जागा हुआ और सोने का बहाना कर रहा हो तो कैसे जगाओगे! तुम धक्का दो, वह करवट लेकर फिर पड़ा रहेगा। सोये आदमी को जगाया जा सकता है, जागे हुए को, जो सोने का बहाना कर रहा है, कैसे जगाओगे! कोई उपाय नहीं है।

अहंकार कुछ है थोड़े ही सिर्फ धारणा है। वास्तविक होता तो आपरेशन हो सकता था; काट कर अलग कर देते। लेकिन वास्तविक है नहीं। तुम भी अपने भीतर जा कर खोजोगे तो कहीं न पाओगे। बोधिधर्म चीन गया तो चीन का सम्राट उससे मिलने आया और उसने कहा. और सब तो ठीक है, यह अहंकार मुझे बहुत अशांत किए रहता है। बोधिधर्म ने कहा : ऐसा करो, सुबह तीन बजे आ जाओ और अहंकार को साथ लेकर आना। मैं बिलकुल शांत ही कर दूंगा।

वह थोड़ा डरा। तीन बजे रात! और यह आदमी कह रहा है अहंकार को साथ ही ले आना। और मैं बिलकुल शांत ही कर दूंगा, एकबारगी में निपटारा कर दूंगा! यह आदमी पागल तो नहीं है! यह क्या कह रहा है! लेकिन यह आदमी था बड़ा प्रभावशाली बोधिधर्म। इसकी प्रतिभा बड़ी अदभुत थी। इसके आसपास की हवा में बात थी। तो सम्राट आकर्षित तो हुआ। और ऐसा किसी ने कभी कहा भी नहीं था कि बस आ जाओ, खतम कर देंगे एक बार में, यह क्या बार बार लगा रखना!

जब वह लौटने लगा, सीढियां उतर रहा था, तब बोधिधर्म ने फिर डंडा बजा कर कहा कि सुनो, भूल मत जाना, तीन बजे आ जाना और यह मत भूल जाना कि अहंकार साथ ले आना, नहीं तो कहीं घर छोड़ आओ! सम्राट सोचने लगा, यह क्या पागल है आदमी! घर छोड़ आऊंगा! अहंकार कोई चीज है जो घर छोड़ आऊंगा!

रात भर सो न सका। कई बार सोचा कि न जाये, क्योंकि उस अंधेरी रात में, तीन बजे रात उस मंदिर में, एकांत में, यह आदमी कुछ भरोसे का नहीं, डंडा मारने लगे या कुछ करने लगे! इसकी बात  चीत ऐसी है। लेकिन आकर्षण अदम्य था, रुक भी न पाया; तीन बजे उठ ही आया। उसके वजीरों ने भी कहा कि यह उचित नहीं है, क्योंकि यह आदमी कुछ अभी नया नया आया है। कुछ देर रुके। यह कुछ भरोसे का नहीं है। इसकी बातें उल्टी हैं। और भी लोगों से इसने कुछ इसी तरह की अनर्गल बातें कही हैं। आप थोड़े ठहरें।

लेकिन सम्राट ने कहा कि नहीं, उसने बुलाया और ऐसा किसी ने कभी कहा भी तो नहीं था, आश्वासन भी किसी ने नहीं दिया था, मैं जाऊंगा, देखूं क्या होता है।

सम्राट गया। कपता कंपता, डरता डरता सीढ़ियां चढ़ा। बोधिधर्म बैठा था वहा डंडा लिए। उसने कहा : बैठे जाओ सामने। ले आये अहंकार?

सम्राट ने कहा. आप कैसी बातें करते हैं! अहंकार कोई र्च।ज थोड़े ही है, मैं ले आऊं!

तो बोधिधर्म हंसा। उसने कहा. तो पचास प्रतिशत काम तो हल ही हो गया। चीज नहीं है अहंकार, वस्तु नहीं है, कुछ है नहीं!

सम्राट ने कहा : कोई वस्तु थोड़े ही है; सिर्फ ख्याल है। तो उसने कहा. चलो आधा तो मामला हल ही हुआ। अब ख्याल ही रह गये, ख्याल को ही हटाना है, आंख बंद कर लो और ख्याल को खोजो कि कहां है! भीतर जाओ, ठीक से जांच पड़ताल करो कि अहंकार कहा छिपा बैठा है। और मैं यहां डंडा लिए बैठा हूं जैसे तुम पकड़ लो भीतर, सिर हिला देना, उसी वक्त खात्मा कर दूंगा।

अब तो सम्राट बहुत घबड़ाया। आंख तो बंद कर ली और इस डर में और घबड़ाहट में गया भी भीतर, सब तरफ झांकने भी लगा। अहंकार का तो कहीं पता भी न चला। घंटे बीत गये वह एक गहरे ध्यान में लीन हो गया। सूरज उगने लगा सुबह का और वह तल्लीन हो गया। इस अहंकार को खोजने के लिए इतनी आतुरता से गया कि विचार तो बंद हो गये।

जब तुम वस्तुत: त्वरा और तीव्रता से भीतर जाओगे, विचार बंद हो जायेंगे। मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, क्या करें, ध्यान नहीं होता, विचार विचार चलते रहते हैं! तुम कभी. भीतर जाने की त्वरा ही नहीं तुम्हारे भीतर। मुर्दे मुर्दे जाते हो कि चलो देखें, शायद! इस 'शायद' से काम नहीं होता कि चलो ये कहते हैं, जरा आंख बंद करके देख लें एक सेकेंड कि क्या होता है!

और बोधिधर्म सामने बैठा था डंडा लिए और वह डंडा मार सकता है। सम्राट गया। उसने सब तरफ खोजा। कहीं कोई अहंकार नहीं। अहंकार की तो बात दूर, अहंकार की छया भी नहीं।’मैं' का भाव ही कहीं भीतर नहीं है। तुम हो, 'मैं' नहीं है। अस्तित्व है, 'मैं' नहीं है।’मैं' का कोई काटा ही नहीं गड़ा है कहीं भीतर।. शांत होने लगा। फिर तो बोधिधर्म ने, जब सूरज उगने लगा, उसे हिलाया और कहा कि बस आंख खोलो, अब मुझे उत्तर दे दो।

सम्राट पैरों पर गिर पड़ा। उसने कहा : आपने ठीक वचन दिया था, आपने निश्चित ही मिटा दिया। मैं कभी भीतर गया ही नहीं। मैं बाहर ही तलाश करता रहा कि अहंकार से कैसे छुटकारा हो। और अहंकार तो केवल धारणा मात्र है।

कोई भी बच्चा अहंकार लेकर थोड़े ही पैदा होता है, हम सिखा देते हैं। सीखी हुई बात है। सिर्फ सीखी हुई बात को भूलना है। कुछ है नहीं।

तुम कभी शांत बैठ कर खोजो. क्या है अहंकार? तुम कुछ नहीं पाओगे। जो बू सम्राट बू ने नहीं पाया, तुम भी नहीं पाओगे। अहंकार सिर्फ एक ख्याल है? एक सपना है कि मैं कुछ हूं। इसीलिए तो हर कोई तोड़ देता है तुम्हारे अहंकार को। रास्ते पर चले जा रहे हैं, किसी ने धक्का दे दिया।

ओशो 
अष्टावक्र महागीता प्रवचन ६०
संकलन: डी जी शास्त्री 

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