*अमृत की उपलब्‍धि मृत्‍यु के द्वार पर*कैसे होती है?


ह्रदय की कुल मिलाकर एक सौ एक नाड़ियां हैं। उनमें से एक नाड़ी मूर्धा, कपाल की ओर निकली हुई है इसे ही सुषुम्ना कहते हैं। उसके द्वारा ऊपर के लोकों में जाकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है। दूसरी एक सौ कड़ियां मरणकाल में जीव को नाना प्रकार की योनियों में ले जाने की हेतु होती हैं

योग का नाड़ियों के संबंध में अपना विशिष्ट विज्ञान है। आधुनिक शरीर-शास्त्र उससे राजी नहीं है। योग ने जिन नाड़ियों की चर्चा की है, वैज्ञानिक उस तरह की किसी भी नाड़ी को मनुष्य के भीतर नहीं पाते हैं। या जिन नाड़ियों को पाते हैं, उनसे योग के द्वारा प्रतिपादित नाड़ियों का कोई तालमेल नहीं है। योगियों ने इस संबंध में बड़ी चेष्टा भी की। विशेषकर पश्चिमी-शिक्षा प्राप्त योगियों ने या उन चिकित्सकों ने, शरीर-शास्त्रियों ने जो योग से परिचित हैं, योग की नाड़ियों और आधुनिक विशान के द्वारा खोजी गई मनुष्य की नाड़ियों के बीच तालमेल बिठाने की अथक चेष्टा की। पर वह चेष्टा पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि बहुत मौलिक रूप से भ्रांत और गलत है। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है।

योग जिन नाड़ियों की बात करता है, वे ठीक इस भौतिक-शरीर की नाड़िया नहीं हैं। इसलिए इस भौतिक-शरीर में उन्हें नहीं पाया जा सकता है। और जो लोग भी कोशिश करते हैं कि इस भौति-शरीर की नाड़ियों से उनका तालमेल बिठा दें, वे योग का हित नहीं करते हैं, अहित करते हैं।

योग किसी और ही शरीर की बात कर रहा है, जिसे सूक्ष्म-शरीर कहते हैं। वह इस शरीर के भीतर ही छिपा हुआ है। लेकिन स्थूल नहीं है, सूक्ष्म है। सूक्ष्म से अर्थ है कि वह शरीर पदार्थगत कम, ऊर्जागत ज्यादा है। वह एनर्जी-बॉडी है या जिसको रूस के वैज्ञानिक बायो-इलेक्ट्रिसिटी कहते हैं, जीव-विद्युत कहते हैं, उसका शरीर है।

इस शरीर के ठीक भीतर छिपा हुआ विद्युत का एक शरीर है। इस बात पर अब वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हो गए हैं। और यह जो विद्युत का शरीर है, वही इस शरीर को भी चलाता है।

रूस में एक बहुत महान प्रयोग चल रहा है। एक वैज्ञानिक विचारक, चित्रकार और फोटोग्राफर है, जिसने एक नए ढंग की फोटोग्राफी विकसित की है--किर्लियान। यह फोटोग्राफी मनुष्य के, या पशुओं के, या पौधों के विद्युत-शरीर का चित्र लेती है। जैसे एक्स-रे से आपके भीतर की हड्डियों का चित्र आ जाता है। शरीर को एक्स-रे पार करके आपके भीतर के ढ़ांचे को पकड़ लेती है, ठीक इसी तरह किर्लियान ने इस तरह की फोटोग्राफी विकसित की है जो आपके शरीर की ऊर्जा-देह को पकड़ती है।

यह ऊर्जा-देह जिन व्यक्तियों में एक सौ स्कर्वी नाड़ी में प्रविष्ट हो जाती है, यह ऊर्जा का प्रवाह, उनके मस्तिष्क के चारों तरफ एक आभामंडल, एक ऑस निर्मित हो जाता है। कृष्ण, बुद्ध, महावीर और क्राइस्ट उनके चित्रों के आसपास आपने एक आभामंडल बना देखा होगा। वह आभामंडल साधारण आखो से दिखाई नहीं पड़ता है। लेकिन जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में, जिसे योग सुषुम्ना कहता है-एक सौ एकवीं नाड़ी जिसे योग ने कहा है-उसमें जब जीवन की ऊर्जा प्रविष्ट हो जाती है, तो सारे मस्तिष्क के चारों तरफ एक विद्युत का मंडल निर्मित हो जाता है।

यह विद्युतमंडल, जो लोग ध्यान को उपलब्ध हैं, उन्हें दिखाई भी पड़ने लगता है। जो जितने शांत हो जाते हैं, उतना ही यह विद्युतमंडल उन्हें दिखाई पड़ने लगता है; दूसरे के ऊपर भी दिखाई पड़ने लगता है। ऐसा विद्युतमंडल हर एक प्राणी के आसपास है। और वह विद्युतमंडल बताता है कि प्राणी किस अवस्था में है।

किर्लियान का कहना है कि कोई भी बीमारी मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो, इसके पहले उसके विद्युत-शरीर में प्रविष्ट होती है। और यह फासला छह महीने का होता है। अगर आप टी बी से बीमार पड़ने वाले हैं तो छह महीने बाद.. आज आपका विद्युत-शरीर रुग्ण होगा, तो छह महीने बाद आपका भौतिक-शरीर रुग्ण होगा। विद्युत-शरीर से भौतिक-शरीर तक की यात्रा छह महीने में होगी।

किर्लियान का कहना है, यह जो विद्युत-ऊर्जा है, इसका चित्र अगर पकड़ लिया जाए, तो आदमी के बीमार होने के पहले हम उसे स्वस्थ कर सकते हैं। यह आधुनिकतम महानतम खोजों में से एक है। क्योंकि एक आदमी बीमार पड़ जाए, फिर उसे स्वस्थ करना अत्यंत कष्टपूर्ण है। बीमार पड़ने के पहले, यह भौतिक-देह बीमार पड़े इसके पहले इसे स्वस्थ किया जा सकता है।

लेकिन पता बीमार को भी नहीं चलता छह महीने पहले कि मैं बीमार पड़ रहा हूं। लेकिन विद्युत-शरीर पर प्रभाव अंकित हो जाते हैं। विद्युत-शरीर उदास हो जाता है, उसकी ऊर्जा धीमी पड़ जाती है। जैसे बल्व में अचानक विद्युत का प्रवाह कम हो गया हो, मंदा हो जाए, पीला हो जाए। जब व्यक्ति स्वस्थ होता है, तो उसकी शरीर की विद्युत प्रकाशित होती है। अपनी पूरी ऊर्जा में जगती है। और जैसे बीमार होने के करीब होता है, वैसे उसकी ऊर्जा मंदी हो जाती है। शरीर में विद्युत कम दौड़ रही है। छह महीने बाद भौतिक-शरीर उससे प्रभावित हो जाएगा। और अगर इसका पता चल जाए, तो पहले ही इलाज किया जा सकता है। मरीज के बीमार होने के पहले, मरीज को पता चलने के पहले कि वह बीमार हुआ, बीमारी से मुक्त हुआ जा सकता है।

इधर पच्चीस साल में इस दिशा में रूस में बहुत बड़ा कार्य हुआ है। कली खिलती है फूल की, उसके कई घंटों पहले कली के भीतर छिपा हुआ जो ऊर्जा-शरीर है वह खिल जाता है, कई घंटे पहले। जब वह ऊर्जा-शरीर खिल जाता है-जों हमें दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन किर्लियान उसके फोटो ले लेता है, उसने बड़ी संवेदनशील फिल्में निर्मित की हैं--जब वह विद्युत-शरीर खिल जाता है, कुछ घंटों बाद भौतिक-शरीर भी कली का खिल जाता है। एक गुलाब की बंद कली का किर्लियान फोटो लेगा, तो जैसा फोटो उसका विद्युत-शरीर का आएगा, बाद में जब फूल खिलेगा तो ठीक वैसा ही खिलेगा, जैसे पहले विद्युत-शरीर खिल गया था।

यह जो योग ने जिन नाड़ियों की बात की है, यह विद्युत-शरीर की बात है। इस भौतिक-शरीर से इसका कोई संबंध सीधा नहीं है। यद्यपि भौतिक-शरीर पर परिणाम होंगे। विद्युत-शरीर में जो भी अंतर पड़ेंगे, उसके भौतिक-शरीर पर भी परिणाम होंगे। इसलिए योगी अपनी मृत्यु छह महीने पहले बता सकता है। यह हमने बहुत बार सुना है। लेकिन किर्लियान ने छह महीने का फासला अभी वैशानिक रूप से सिद्ध किया है।

योग का अनुभव है कि ठीक मरने के छह महीने पहले विद्युत- ऊर्जा बिलकुल क्षीण हो जाती है। सिर्फ टिमटिमाने लगती है। उससे खबर मिल जाती है कि अब यह शरीर ज्यादा से ज्यादा छह महीने चल सकता है। मरते हुए आदमी को छह महीने पहले अपनी नाक दिखाई पड़नी बंद हो जाती है। और जब आपको अपनी नाक दिखाई पड़नी बंद हो जाए, तो आप समझना कि छह महीने के भीतर आप लीन हो जाएगी किर्लियान भी कहता है कि यह घटना घटती है।

 ओशो; कठोउपनिषद--प्रवचन--17

संकलन: डी जी शास्त्री 

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