क्या है मनन, एकाग्रता और ध्यान के अर्थ ?


मनन का अर्थ है विचारना, दिशाबद्ध विचारना। हम सब विचार करते हैं, लेकिन वह मनन नहीं है। वह विचारना दिशा-रहित है, अस्पष्ट है; कही जाता हुआ नहीं है। असल में हमारा विचारना मनन नहीं है, बल्कि फ्रायडवादियों की भाषा में उसे एसोसिएशन कहना चाहिए। तुम्हारे अनजाने ही एक विचार दूसरे विचार को जन्म दिए जाता है। एसोसिएशन के कारण एक विचार अपने आप ही दूसरे विचार पर चला जाता है।

तुम एक कुत्ते को गली पार करते देखते हो। जिस क्षण तुम कुत्ते को देखते हो, तुम्हारा मन कुत्तों के संबंध में सोचने लगता है। कुत्ता तुम्हें ले चला । और फिर मन के अनेक एसोसिएशन हैं।

जब तुम बच्चे थे तुम एक विशेष कुत्ते से डरा करते थे। वह कुत्ता तुम्हारे मन में उभर आता है और उसके साथ तुम्हारा बचपन चला आता है। फिर कुत्ते तो भूल जाते हैं और एसोसिएशन के प्रभाव के कारण तुम अपने बचपन के संबंध में दिवा-स्वप्न देखने लगते हो। और फिर बचपन के साथ जुड़ी हुई अनेक चीजें आती हैं, और तुम उनके बीच चक्कर काटने लगते हो।

जब तुम्हें फुरसत हो तो तुम सोचने से पीछे चलो, विचारने से पीछे हटकर वहां जाओ जहां से विचार आया। एक-एक कदम पीछे हटो। और तब तुम पाओगे कि वहां कोई दूसरा विचार था जो इस विचार को लाया। और उनके बीच कोई संगति नहीं है। तुम्हारे बचपन के साथ इस गली के कुत्ते का क्या लेना-देना है! कोई संगति नहीं है, मन का एसोसिएशन है। अगर मैं गली पार करूं तो वह कुत्ता मुझे मेरे बचपन में नहीं ले लाएगा, कहीं अन्यत्र ले जाएगा। किसी तीसरे व्यक्ति को वह कहीं और ले जाएगा।

हरेक आदमी के मन में एसोसिएशन की श्रृंखला है।
कोई भी घटना एसोसिएशन की श्रृंखला से जुड़ जाती है।
तब मन कंप्यूटर की भांति काम करने लगता है। तब एक चीज से दूसरी चीज, दूसरी से तीसरी  निकलती चली जाती है। यही तुम दिनभर करते रहते हो।

जो भी तुम्हारे मन में आए उसे ईमानदारी से एक कागज के टुकड़े पर लिख लो। तुम हैरान होओगे कि यह क्या मेरे मन में चल रहा है! दो विचरों के बीच कोई संबंध नहीं है। और तुम इसी तरह के विचार करते रहते हो। 

तुम इसे विचारना कहते हो? यह सिर्फ एक विचार के साथ एसोसिएशन है, और तुम उनके साथ बह रहे हो।

विचार तब मनन बनता है जब वह एसोसिएशन के कारण नहीं, निर्देशन से चलता है। अगर तुम किसी खास समस्या पर काम कर रहे हो तो तुम सब एसोसिएशन की श्रृंखला को अलग कर देते हो और उसी एक समस्या के साथ गति करते हो । तब तुम अपने मन को निर्देश देते हो। मन तब इधर-उधर से, किसी पगडंडी से किसी एसोसिएशन की श्रृंखला पकड़कर भागने की चेष्टा करेगा। लेकिन तुम सभी अन्य रास्तों को रोक देते हो और मन को एक मार्ग से ले चलते हो। तब तुम अपने मन को दिशा देते हो।

किसी समस्या में संलग्न एक वैज्ञानिक मनन में होता है।
वैसे ही किसी समस्या में उलझा हुआ तार्किक या गणितज्ञ मनन करता है। जब कवि किसी फूल पर मनन करता है तब शेष संसार उसके मन से ओझल हो जाता है।

तब दो ही होते हैं, फूल और कवि, और कवि फूल के साथ यात्रा करता है। रास्ते के किनारों से अनेक चीजें आकर्षित करेंगी, लेकिन वह अपने मन को कहीं नहीं जाने देता है। मन एक ही दिशा में गति करता है--निर्देशित। यह मनन है। विज्ञान मनन पर आधारित है।

कोई भी तार्किक विचारना मनन है। उसमें विचार निर्देशित है, दिशाबद्ध है। विचार की दिशा निश्चित है। सामान्य विचारना तो व्यर्थ है। मनन तर्कपूर्ण है,बुद्धिपूर्ण है।

फिर एकाग्रता है। एकाग्रता एक बिंदु पर ठहर जाना है।
यह विचारना नहीं है, एक बिंदु पर होने को एकाग्रता कहते हैं। सामान्य विचारना...में मन पागल की तरह गति करता है। 

मनन में पागल मन निर्देशित हो जाता है; उसे जहां-तहां जाने की छूट नहीं है। एकाग्रता में मन को गति की ही छूट नहीं रहती । साधारण विचारना में मन कहीं भी गति कर सकता है; मनन में किसी दिशा-विशेष में ही गति कर सकता है; 

एकाग्रता में वह कहीं भी नहीं गति कर सकता है; 
एकाग्रता में उसे एक बिंदु पर ही रहने दिया जाता है। 
सारी ऊर्जा, सारी गति एक बिंदु पर स्थिर हो जाती है।
योग का सबंध एकाग्रता से है।

साधारण मन दिशाहीन, अनियंत्रित विचारना से संबंधित है और वैज्ञानिक मन दिशाबद्ध विचारना से। योगी का चित्त अपने चिन्तन को एक बिंदु पर केंद्रित रखता है, वह उसे गति नहीं करने देता।

और फिर है ध्यान। साधारण विचारना में मन कहीं भी जा सकता है। मनन में उसे एक दिशा में गति करने की इजाजत है, दूसरी सब दिशाएं वर्जित हैं। 

एकाग्रता में मन को किसी भी दिशा में गति करने की इजाजत नहीं है, उसे सिर्फ एक बिंदु पर एकाग्र होने की छूट है। और ध्यान में मन है ही नहीं। ध्यान अ-मन की दशा है। 

ये चार अवस्थाएं हैं : साधारण विचारना, मनन, एकाग्रता और ध्यान...।
#ओशो ~ विज्ञान भैरव तंत्र
संकलन: डी जी शास्त्री 

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