पांच जीवन सत्य ,जो मैंने महाभारत से सीखा ।

पांच जीवन सत्य ,जो मैंने महाभारत से सीखा ।  


मेरे कुछ ऐसे भी साथी है , जो  मुझसे से नाराज हो गए ,एक सवाल कई बार उठाया गया , के इतिहास जानना क्यों जरूरी है , हो गया वह हो गया।   लेकिन यही हमारी भूल है जो चुनौतियां तब थी ,वही आज भी है। रंग रूप बदल गया है। मै शास्त्रों का ज्ञाता नहीं हूं ,पंडित नहीं हूं लेकिन इतिहास  प्रेमी जरूर हूं। वह  इतिहास मैं आपके साथ बांटना चाहता हूं | 1988 में मेरी उम्र ३५  साल की थी ,जब मैंने टेलीविजन पर पहली बार महाभारत देखी। टीवी पर तो खत्म हो गई, लेकिन मेरे मन में महाभारत का  पन्ना रोज खुलता रहा  | मैं हैरान रह जाता ,यह सोच कर कि 5000 साल पहले जो हुआ , उससे आज कितना कुछ सीखा जा सकता है | समझा जा सकता है, और अपनी सफलता के लिए अप्लाई किया जा जा सकता है।  मैं आपको बताऊंगा सफलता के पांच सूत्र। आपके सामने किसी न किसी रूप में जो आज भी  उपयोगी और प्रभावशाली है। 

1. Quantity  नहीं ,Quality  चुने 

कहीं ऐसा तो नहीं कि ज्यादा पाने की दौड़ में, हम कम और बहुत कम की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। कृष्ण के संबंध कौरव और पांडवों दोनों से थे। कृष्ण दोनों में किसी का भी विनाश नहीं चाहते थे। आखिर तक युद्ध को  टालने का प्रयास करते रहे।  पांडवों का संधि प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर भी गए।  

मैत्री की राह बताने को , सबको सुमार्ग पर लाने को ,

दुर्योधन को समझाने को ,भीषण विध्वंस बचाने को

भगवान हस्तिनापुर आए ,पांडव का संदेशा लाये

दो न्याय अगर तो आधा दो पर इसमें भी यदि बाधा हो

तो दे दो केवल 5 ग्राम ,रखो अपनी धरती तमाम

हम वहीं खुशी से खाएंगे , पर उफ्फ  न उठायेंगे,

दुर्योधन वह भी दे न सका , आशीष प्रभु  की ले न सका

अब तो युद्ध अवश्यंभावी था  अर्जुन एक तरफ और  दूसरी तरफ,नारायणी सेना जिसमे हाथी ,घोड़े और रथ है दूसरी तरफ नारायण है। कृष्ण ने दुर्योधन को पूछा ,जो चाहिए ले लो । चुनाव का क्या परिणाम हुआ ,हम सब जानते है।  दुर्योधन ने क्वांटिटी -Quantity चुनी।   

2. समय के साथ बदल जाये 

शकुनि के फेंके हुए पासो ने पांडवों को जीवित ही मार डाला ,द्रुत क्रीड़ा में हरा दिया और उन्हें 12 साल का बनवास और 1 साल का अज्ञातवास लेना पड़ा। शर्त यह थी कि अगर अज्ञातवास के 1 साल में पांडवों में से कोई भी पहचान लिया गया तो 12 साल का एक और अज्ञातवास फिर से शुरू हो जाएगा। अज्ञातवास की परिस्थिति कितनी कठिन थी, आप अंदाजा लगा सकते हैं। पांडवो को  हर हाल में हजारों लाखों में पहचान लिया जा सकता था। वह दिव्य  पांडू पुत्र राजकुमार दुनिया में सबसे बड़े बलवान और ज्ञानी थे।  

पांचाली त्रिलोक ब्रह्मांड की सबसे दिव्य स्त्री जिनका ,अपना अज्ञात रहना एक असंभव चुनौती थी। लेकिन इस चुनौती से घबराये नहीं।  इस पर आंसू बहाने की जगह पांडवों ने तय किया कि, समय बदला है तो , हम भी बदल जाएंगे।  राजा विराट के यहां पहुंच कर ,अर्जुन जैसा वीर पुरुष गांडीवधारी वेश बदलकर ,एक राजा की बेटी -उतरा को नृत्य सिखाने लगा।  भीम  का भोजन सैकड़ों रसोईया मिलकर बनाते थे , वह खुद रसोईया बन गए ,और द्रौपदी जिनके आगे पीछे दासियाँ चलती थी, वह स्वयं दासी बनकर -रानी सुदेशना की सेवा करने लगी।  जब समय की आंधी उल्टी चल रही हो तो उसकी तरफ पीठ कर लेने में ही भलाई है। ये वक्त गुजर जायेगा। 

3. सम्बन्ध मजबूत तो हम मजबूत 

 कामयाबी के लिए जरूरी है ,आपको दूसरों की जरूरत पड़ने वाली है , कल पर नजर रखी ,दूर दृष्टि रखे।  पांडवों के पास कुछ नहीं था ,हथियार नहीं थे , लेकिन संबंध थे जो उन्होंने अलग-अलग समय पर जोड़ रखे थे।  द्रोपदी से ब्याह किया तो उनके पिता पांचाल नरेश संबंधित ,अर्जुन ने कृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया तो ,कृष्ण की राजधानी कुरुक्षेत्र में मत्स्य पांडवों की ओर से लड़ी।  पांडवों ने तमाम बाधाओं के बावजूद अगर कुरुक्षेत्र कारण युद्ध जीता तो इन्हीं संबंधों के बल पर।  सबंधो से सफलता की संभावना बढ़ जाती है  

4. अपडेटेड रहे 

प्राकृतिक जन्मजात योद्धा अर्जुन ने तो फिर भी रण कौशल गुरु से सीखा था।  अभिमन्यु ने तो जन्म से ,कहते हैं उसने मां के पेट में ही चक्रव्यूह तोड़ने की विद्या सीख ली थी । लेकिन गलती क्या हुई उसने अपनी विद्या को कभी अपडेट नहीं किया जितना सीखा था उसी पर रुक गया ,शिक्षा कभी पूरी नहीं की - परिणाम - शत्रु का चक्रव्यूह तोड़कर , उसमें प्रवेश तो कर गया ,लेकिन जीवित वापस नहीं लौट पाया। | अर्जुन कुमार की कथा जब जब भी सुनाने में आती है।  सभ्यता के नाम पर रोना आता है। संहार का तांडव भी उस पर रोटा है। संभावनाओं से भरा हुआ एक तेजस्वी युवक , जिसका भविष्य उज्जवल था ,मौत की गहरी नींद  में सो गया। विजई होकर वापस आने के लिए , अपने आपको हमेशा अपडेट रखें

5. महत्वकांक्षी बने ,लालची नहीं 

आप  बहुत बड़े आदमी बनना चाहते हैं।  बहुत पैसा कमाना चाहते हैं।  नाम और शोहरत की  महत्वाकांक्षा है | लेकिन यह सब अगर आप किसी का अधिकार छीन के, किसी का हक मारकर करना चाहते हैं तो यह इतनी अच्छी चीज नहीं है। दुर्योधन जो  चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहता था, वह उसकी महत्वाकांक्षा थी। दुर्योधन ने कर्म का संतुलन बिगाड़ दिया और फिर क्या हुआ हस्तिनापुर का वो राजा , जो जमीन पर पैर नहीं रखता था ,कुरुक्षेत्र की धूल में सो गया। 

इस लिए अपनी एंबीशंस को कभी ग्रीड -GREED में ना बदलने दें, ध्यान रखें कि आप की महत्वाकांक्षा कभी भी लालची न बने  

D.G.Shastri


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यायाम हृदय संबंधी समस्याओं की पहचान कैसे करते हैं?

स्टॉप ओवररिएक्टिंग —एक विस्तृत और प्रोफेशनल हिंदी सारांश

डोंट गिव द एनिमी ए सीट एट योर टेबल' बाहरी दुश्मनों के बारे में बात नहीं करती; यह उन अंदरूनी आवाज़ों के